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तरही ग़ज़ल

दोस्तो गर ज़िन्दगी में कामरानी चाहिए
ज़ह्न-ओ-दिल से गर्द नफ़रत की हटानी चाहिए

अर्ज़ कर दूँ आख़िरी ख़्वाहिश इजाज़त हो अगर
एक शब मुझको तुम्हारी मेज़बानी चाहिए

ज़िल्ल-ए-सुब्हानी अगर कुछ आपसे बच पाए तो
हम ग़रीबों को भी थोड़ी शादमानी चाहिए

मूँद कर आँखें न चलना याद रखना ये सबक़
ज़िन्दगी में हर क़दम पर सावधानी चाहिए

ज़िन्दगी में लाज़मी तो है मगर इंसान को
दफ़्न करने के लिये भी माल पानी चाहिए

फ़ज़्ल से रब के मुकम्मल हो गई मेरी ग़ज़ल
दोस्तो अब आपकी बस क़द्र दानी चाहिए

'नूर' साहिब ने लिखी ये ख़त में फ़रमाइश मुझे
हीरे मोती से जड़ी इक कूड़े दानी चाहिए

आज कल तो महफ़िलों में शाइरी के नाम पर
ऐ 'समर' ग़ज़लें नहीं बस नोहा ख़्वानी चाहिए

'समर कबीर'
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Rachna Bhatia on November 9, 2020 at 10:23pm

आदरणिय समर कबीर सर् आदाब। आपने लाजवाब ग़ज़ल कही। हर अश्आर पर दाद क़ुबूल करें। हर अश्आर अपने में बेजोड़ है। हार्दिक बधाई।

Comment by Chetan Prakash on November 9, 2020 at 8:28pm

कहते हैं, बहुत ज़रूरी चीजे जैसै हवा, पानी, धूप और आकाश ईश कृपा से प्राप्त होती है, बिल्कुल फ्री ! मोहतरम जनाब, समर कबीर साहब की ग़जल दीपावली के शुभ अवसर पर हम सब परिवार के सदस्यों के लिए ऐसा ही नायाब तोहफा है। मेहरबानी जैसे शब्द बहुत छोटे है, आपका शुक्रियाअदा करने के लिए, मोहतरम !

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