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जग मिटा कर दुख सुनाने- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२

मत निकल तलवार लेकर
जय  मिलेगी  प्यार लेकर।१।
*
युद्ध  नित   बर्बाद  करता
जी तनिक यह सार लेकर।२।
*
जग मिटा कर दुख सुनाने
जायेगा  किस  द्वार लेकर।३।
*
इस भवन का क्या करूँगा
तुम  गये   आधार   लेकर।४।
*
नेह की दुनिया अलग है
हो जा हल्का भार लेकर।५।
*
बोझ सा हरपल है लगता
दब  गये  आभार  लेकर।६।
*
कर गया कंगाल सब को
हर  भरा  सन्सार  लेकर।७।
*
टूटती  रिश्तों  की माला
जोड़ ले कुछ तार लेकर।८।


मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by नाथ सोनांचली on March 7, 2021 at 8:22pm

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन।अच्छी ग़ज़ल कही आपने। कभी-कभी मुझे लगता है कि छोटी बह्र में पूरी बात नहीं आ पाती। बहरहाल इस ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by TEJ VEER SINGH on March 7, 2021 at 8:02pm

हार्दिक बधाई आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी। बेहतरीन गज़ल।*
बोझ सा हरपल है लगता
दब  गये  आभार  लेकर।६।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2021 at 8:59am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on March 2, 2021 at 7:41pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
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