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ग़ज़ल (जगह दिल में तुम्हारे...)

1222 - 1222 - 1222 - 1222 

(बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम) 

जगह  दिल में  तुम्हारे अब  भी थोड़ी  सी बची  है  क्या

मेरे  बिन  ज़िन्दगी  में  जो  कमी  सी  थी  वही  है  क्या

अभी  तक  आरज़ू  जो  दफ़्न  कर  रक्खी  है  सीने  में 

तड़प  उसकी जो  सुनता हूँ  वो तुमने भी  सुनी है  क्या

तेरे  साँसों   की  गर्मी  से  पिघल  कर   रह  गया  हूँ  मैं 

जो    हालत   हो   गई   मेरी  वही   तेरी  हुई   है   क्या 

मिले  हो जब भी हमसे  बस अचानक  ही  मिले हो तुम 

कभी  आमद  से पहले भी  ख़बर हमको  मिली  है क्या

तमन्ना   है   कि   रस्ता   बन    तुम्हारी    राह   देखूँ   मैं

फिरइक दिन आओ जबभी तुम तो मैं देखूँ ख़ुशी है क्या 

भटकता  फिर  रहा  था  इस  गली  आकर  क़दम ठहरे

कोई  इतना  बता  दे  बस  ये  उसकी  ही  गली  है क्या 

मुझे   सब  लोग   कहते   हैं   दिवाना   है   ये  मजनूँ  है 

जो  है  ये  राय   लोगों   की  तुम्हारी  भी   यही  है  क्या

मैं  हूँ  बेताब-ओ-बेकल  और  तुम  साकिन बनी हो बस

इधर   शोले  दहकते   हैं  उधर   शबनम  पड़ी   है  क्या 

फ़क़त   इक  अश्क-बारी  से  मेरी  तस्कीन  क्या  होगी  

लगी  हो  आग  जब  अन्दर  तो  बाहर  की नमी है क्या 

तुम्हारी    दिल्लगी    ठहरी    हमारी    जान    जाती  है 

'अमीर'  अब  बस करो  देखो  तड़प  ये कह रही है क्या  

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 10, 2021 at 11:16am

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी तशरीफ़ आवरी को ख़ुश आमदीद। सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 10, 2021 at 7:23am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 6, 2021 at 9:12am

जनाब आज़ी तमाम साहिब आदाब, ग़ज़ल पर आपकी तशरीफ़ आवरी को ख़ुश आमदीद। सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई का तह-ए-दिल से शुक्रिया। सादर।

Comment by Aazi Tamaam on July 6, 2021 at 8:44am

सादर प्रणाम आ अमीर जी बेहद खूबसूरत ग़ज़ल हुई है

सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 4, 2021 at 7:34pm

सम्पूर्णरूप से शंका समाधान हुआ है..बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय डिटेल्स में समझाने के लिए..

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on July 4, 2021 at 5:11pm

जनाब बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, आप ग़ज़ल तक आए अपना क़ीमती वक़्त दिया इसके लिए मश्कूर हूँ। आपको ग़ज़ल पसन्द आई शर्फ़ है मेरे लिये।

//5वे शे'र के सानी के शब्द फिरइक को थोड़ा समझना चाहता हूँ इससे 1222 मात्रा की पूर्ति कैसे होती है//

जनाब यहाँ अलिफ़ वस्ल के वजह से. 'फिरइक दिन'  को  'फिरिक दिन' (122) पढ़ा और बोला जाएगा। उम्मीद है शंका समाधान हुआ होगा।

//क्या ऐब-ए-तनाफुर अब उतना महत्पूर्ण नहीं रह गया है?ऐसा देखने में आ रहा है बहुत से लोग इस दोष के साथ ग़ज़ल कह रहे हैं।//

यक़ीनन ऐब-ए-तनाफ़ुर दोष है, मगर अगर शे'र अच्छा हो तो इस ऐब को नज़र-अंदाज़ किया जाता है, यही वज्ह है कि तक़रीबन हर मुस्तनद और मअरूफ़ शुअरा हज़रात भी इससे अछूते नहीं हैं, इतना ही नहीं अगर शे'र बहुत अच्छा है तो ऐब-ए-तक़ाबुल-ए-रदीफ़ (जो कि बनिस्बत बड़ा ऐब है) भी नज़र-अंदाज़ किया जाना मान्य हो चुका है, बशर्ते वो कुल्ली तक़ाबुल-ए-रदीफ़ (जिसे पढ़ या सुन कर रदीफ़ होने का भ्रम हो) न हो।  सादर। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 4, 2021 at 11:28am

बड़ी ही प्यारी ग़ज़ल कही आदरणीय अमीरुद्दीन जी..बहुत बहुत बधाई

5वे शे'र के सानी के शब्द फिरइक को थोड़ा समझना चाहता हूँ इससे 1222 मात्रा की पूर्ति कैसे होती है।ये सिर्फ में जानकारी के लिए पूछ रहा हुँ अन्यथा न लें।

एक बात और जानना चाहता हुँ क्या ऐब-ए-तनाफुर अब उतना महत्पूर्ण नहीं रह गया है?ऐसा देखने में आ रहा है बहुत से लोग इस दोष के साथ ग़ज़ल कह रहे हैं।

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