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पाँच दोहे मेघों पर. . . . .

पाँच दोहे मेघों पर . . . . .

अम्बर में विचरण करे, मेघों का विस्तार  ।
सावन की देने लगी, दस्तक अब बौछार ।।

मेघों का मेला करे, अम्बर का शृंगार ।
आज दिवाकर लग रहा, थोड़ा सा लाचार ।।

थोड़ी सी है धूप तो, थोड़ी सी बरसात ।
अम्बर में  आदित्य को, बादल देते मात ।।

बादल नभ को चूमते, पहन श्वेत परिधान ।
हंसों की ये टोलियाँ, आसमान की शान ।।

नील वसन पर कर दिया, मेघों ने शृंगार ।
धरती पर चलने लगी, शीतल मस्त बयार ।।

सुशील सरना / 24-6-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुन्दर दोहावली हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 28, 2022 at 8:11am

आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, वर्षा ऋतु के आगमन पर सुंदर दोहावली हुई है, हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2022 at 9:08pm
आदरणीय चेतन प्रकाश जी, सादर प्रणाम - सृजन पर आपकी आत्मीय सराहना और सुन्दर सुझाव का दिल से आभार । ऐसे संशोधन निश्चित रूप से सृजन के भावों को समृद्ध करते हैं । दिल से आभार आदरणीय जी ।
Comment by Chetan Prakash on June 25, 2022 at 7:38pm

नमस्कार,  आदरणीय सुशील सरना साहब,  सुन्दर  मेघ- दोहावली  रची, आपने  ! आ. यदि आप  अन्यथा  न ले,  'संसार' होते विचरण का रूप सहज आत्मसात  नहीं होता, सो, कदाचित  विस्तार अपेक्षाकृत  श्रेयस्कर शब्द है । शेष  दोहे , कहना न होगा, मुझे  अच्छे लगे,  बंधुवर  !

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