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जा रे-जा रे कारे काग़ा

जा रे-जा रे कारे कागा मेरे छत पर आना ना 

आना है तो आजा पर छत पर शोर मचाना ना 

तू आएगा छत पर मेरे कांव-कांव चिल्लाएगा 

ना जाने किस अतिथि को मेरे घर बुलाएगा 

उल्टी पड़ी पतीली मेरी और चूल्हे में आंच नहीं 

थाल सजाऊँ कैसे मैं घर में कोई अनाज नहीं 

जा रे-जा रे कारी चींटी मेरे घर तू आना ना 

टूटी मेरी कुटिया में तू अपना घर बसाना ना 

तू आएगी साथ में अपने बैरी बादल लाएगी 

छत से पानी टपकेगा फिर तू चैन से सो ना पाएगी 

कच्ची मेरी कुटिया की फिर गीत जहाँ मे गायेगी 

जो ना जाने हाल को मेरे उसको भी सुनायेगी 

जा रे-जा रे चाँद निगोरे मेरी अटरिया आना ना 

अपनी सुरत में मुझको परदेशी की याद दिलाना ना 

तू आएगा साथ में अपने भूख भी मेरी ले आएगा 

सुनी अँधियारी रातों में रोटी की याद दिलाएगा 

बच्चे मेरे सोये भुखे पेट को गमछे से बांधे

द्वार निहारे नयन से अपने, बापु का रस्ता साधे  

जा रे-जा रे शैतान चकोरे पीहू-पीहू बुलाना ना 

साँझ ढले जब चैन ना आए मन मेरा भटकाना ना  

तू बैठेगा डाल पर मेरे अपने साथी को जोहेगा 

लेकिन मेरा पागल मन फिर प्रिय की यादों में खो जाएगा

वो जो हमको भूल है बैठा, रोटी की परवाह में 

उसको भी ना चैन मिलेगा, हम लोगों की याद में 

"मौलिक व अप्रकाशित" 

अमन सिन्हा 

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 13, 2022 at 6:21pm

अच्छी रचना है भाई अमन...बधाई

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on December 10, 2022 at 5:38pm
बहुत सुन्दर गीत गरीबी और गांव की छवि समेटे , निखार और रखिए।
जय जय श्री राधे
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2022 at 4:01am

आ. भाई अमन जी, अभिवादन। गीत का प्रयास अच्छा है। पर अभी यह कुछ और समय चाहता है। इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 2, 2022 at 7:24pm

बहुत सुंदर मनुहार भरा गीत 
लय कहीं कहीं अटक रही है , वहां साधने की कोशिश हो तो आसानी से गीत सध जाएगा 

बधाई इस अभिव्यक्ति के लिए 

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