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ग़ज़ल (गर आपकी ज़ुबान हो तलवार की तरह)

माना  नज़र  है  तेरी  ख़रीदार  की तरह
लेकिन न लूट तू  मुझे  बाज़ार  की तरह

रिश्ते  बिगड़ते  देर  तनिक भी नहीं लगे
गर आपकी ज़ुबान हो तलवार की तरह

वो तो चुनाव  जीत के  परधान  बन  गया
जो  घूमता  था  गाँव  में  बेकार  की तरह

वादा तो कीजिये नहीं और कर दिए अगर
वादा  खिलाफी हो  नहीं सरकार की तरह

देते  हैं  भाव  नेता  चुनावों  के  वक़्त  पर
और  फेंक  देते  बाद में अख़बार की तरह

शाइर  हूँ  सच  कहूँगा  भले  हुक्मरान  ये
फाँसी  चढ़ा  दें मुझको  गुनहगार की तरह

चहरा कुरूप हो भले ख़ुद का  मगर जनाब
दुल्हन  सभी को  चाहिए  गुलनार की तरह

दारू किसी  के जब  लगे सर चढ़ के बोलने
इंसाँ   वो   झूमता  है    अदाकार  की  तरह

मूछों  प  ताव  देता  है  दूल्हे  का  बाप  पर
दुल्हन  का बाप दिखता है लाचार की तरह

 नाथ सोनांचली

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on May 7, 2023 at 8:19am

आद0 समर कबीर साहब सादर प्रणाम। आपकी उपस्थिति मेरे लिए एक इनआम है। हृदय की गहराइयों से आभार आपका

Comment by Samar kabeer on April 4, 2023 at 3:14pm

जनाब नाथ सोनांचली जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2023 at 2:01pm

आद0 बृजेश कुमार 'ब्रज' जी सादर अभिवादन। आभार आपका आदरणीय

Comment by नाथ सोनांचली on April 4, 2023 at 2:00pm

आद0 लक्ष्मण धामी जी सादर अभिवादन। आभार आपका

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 31, 2023 at 12:13pm

क्या ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय सोनांचली जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 23, 2023 at 1:35pm

आ. भाई नाथ सोनांचली जी, सादर अभिवादन। अच्छी गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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