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अमावास की रात अब बहुत सुकून देती है
वो भी भादों की अमावास हो तो क्या कहने
उसके अलावा हर रात को
किसी न किसी पहर चाँद आ ही जाता है

वो चेहरा
जिस पर मै नाज़ करता था

जिसे मै बस अपना समझता था
दिख जाता है इस निशापति में

 

 

 

इसकी चांदनी
इसकी झलक
ठेल देती है मुझे अतीत में

 जब मै अपने चाँद को
हाथों में लेकर
देखा करता था
अद्भुत सौंदर्यपूर्ण, दागरहित
लगता,  इसी से सृष्टि दृष्टिगोचर है


एक पूरनमासी,
जो अँधेरा भर गयी मेरे जीवन में
चाँद मेरे सामने था, और भी चमकदार
किन्तु मेरी निशा काली, और भी काली
 वो मेरी हथेलियों से छलक कर,

अन्य अंक का हो गया था
इस गुरुत्व प्रभाव से दृग समंदर में

ज्वारीय तूफ़ान उमड़ पड़ा था

चक्षुपट जब तक रोकें
झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था
मेरे लिए बची थी
उजली रात की काली रजनी
भादों की अमावास

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Comment

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Comment by deepti sharma on July 12, 2012 at 1:19am

बहुत खूब. बधाई.

Comment by AK Rajput on December 5, 2011 at 11:23am

चक्षुपट जब तक रोकें
झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था...
शानदार प्रस्तुति ,

Comment by आशीष यादव on October 13, 2011 at 8:39am

thank you aadarniya mohinichordia ji.

Comment by mohinichordia on October 5, 2011 at 7:27am

 बहुत  मार्मिक रचना है आपकी 

 

Comment by आशीष यादव on October 2, 2011 at 11:35pm

आदरणीय श्री Arun Kumar Pandey 'Abhinav' जी, एवं Veerendra Jain जी,

आप लोगो ने मेरी रचना को मान दिया| मुझे बहुत हर्ष हो रहा है| आप लोगो का आशीर्वाद यूँ  ही  मिलता रहेगा तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी| 
आप लोगों को धन्यवाद|

Comment by Abhinav Arun on October 2, 2011 at 12:59pm

आहा ! आशीष जी यह नयी रचना आपकी रचनाधर्मिता की ऊँची उड़ान की परिचायक है और वो भी बहुत सशक्त !! हार्दिक बधाई इस शानदार प्रस्तुति के लिए !!

Comment by Veerendra Jain on September 29, 2011 at 1:59pm

bahut hi badhiya rachna..ashish ji..bahut bahut badhai ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 27, 2011 at 9:16pm

आपका आभार आशीषजी. आपने जो बहुत मान दिया है.

धन्यवाद.

 

Comment by आशीष यादव on September 27, 2011 at 2:58pm

आदरणीय sanjiv verma 'salil' जी, आदरणीय Brij bhushan choubey जी, एवं आदरणीय Saurabh Pandey जी, आप लोगो को मेरी यह रचना अच्छी लगी यह जान कर मै बहुत खुश हूँ| एवं धन्यवाद देता हूँ|

 आदरणीय Saurabh Pandey जी, आप का सुझाव अच्छा है,  इस से थोडा सा अर्थ बदल रहा है जो की अच्छा ही है| मेरे लिखे का अर्थ पूरी दुनिया के लिए और आप के सुझाव का अर्थ मेरे लिए है| अच्छे सुझाव के लिए मै धन्यवाद देता हूँ|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 27, 2011 at 1:49pm

//चक्षुपट जब तक रोकें

झरना अपनी सरहदें छोड़ चुका था

मेरे लिए बची थी

उजली रात की काली रजनी

भादों की अमावास//

इन पंक्तियों पर मेरी बधाइयाँ लें. 

 

 

//लगता, इसी से सृष्टि दृष्टिगोचर है //

’इसी से’ की जगह ’इसी में’ क्या सर्वोचित न होगा ? देखियेगा. 

इस परिमार्जन को सतत बनाये रखें. शुभेच्छा .. .


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