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قتل حین

कातिल हैं

तेरी बेरुखी तेरा ग़म
मेरी तकदीर में शामिल है
कभी तो करते हमपे यकीं
के हम भी तेरे काबिल हैं
तेरी बेरुखी तेरा ग़म----
लाख जुदाई हो तो क्या
यादों में कभी हो ना कमीं
बचा लेंगे मंझधार से भी
हम ही तेरे साहिल हैं
तेरी बेरुखी तेरा ग़म----
क़त्ल भी कर दो उफ़ ना करें
हँसते हँसते मर जाएंगे
ना ज़िक्र करेंगे दुनियां से
कि आप ही मेरे कातिल हैं
तेरी बेरुखी तेरा ग़म----
हम 'दीपक' थे जल जाते खुद
क्यों आपने ज़हमत की ए-दोस्त
अफ़सोस है मुझे जलाने में
आप भी तो शामिल हैं
तेरी बेरुखी तेरा ग़म---

दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'
09136211486
دیپاک شارما کوللووی

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Comment

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Comment by Anand Vats on August 18, 2010 at 11:04am
जबरदस्त लिखा है | बहुत बहुत बधाई |

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 17, 2010 at 11:15pm
बेहतरीन....अफ़सोस है मुझे जलाने में
आप भी तो शामिल हैं

दाद कबूल करे
Comment by Deepak Sharma Kuluvi on August 17, 2010 at 12:17pm
DHANYABAAD EVERYBODY
Comment by आशीष यादव on August 17, 2010 at 12:50am
हम 'दीपक' थे जल जाते खुद
क्यों आपने ज़हमत की ए-दोस्त
अफ़सोस है मुझे जलाने में
आप भी तो शामिल हैं
kya khubsurat panktiya pesh ki hai aapne.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 16, 2010 at 11:08pm
क़त्ल भी कर दो उफ़ ना करें
हँसते हँसते मर जाएंगे
ना ज़िक्र करेंगे दुनियां से
कि आप ही मेरे कातिल हैं
वाह दीपक साहब वाह, ऐसी मुहब्बत को कौन ना सजदा करेगा, अच्छी अभिव्यक्ति, इस शानदार रचना पर बहुत बहुत बधाई,

कृपया ध्यान दे...

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