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क्या बोलूँ अब क्या लगता है..

चाहत में घन-पुरवाई है
किन्तु, पहुँच ना सुनवाई है
मेघ घिरे फिर भी ना बरसे तो मौसम ये लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?!

आस भरा 'थप-थप' चलता था
’ताता-थइया’ उठ गिरता था
आज पिघलती सड़कों पर निरुपाय खड़ा है, लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?!

ओढ़ गंध बन-ठन जाने का
शोर बहुत है खिल जाने का
लद गई उन्मन डाली भी यों कि अँदेसा लगता है.. क्या बोलूँ अब क्या लगता है?

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Comment by Aparna Bhatnagar on September 23, 2010 at 7:27pm
sundar geet !
Comment by sanjiv verma 'salil' on August 22, 2010 at 2:02pm
सरस गीति रचना. बधाई.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 19, 2010 at 8:19pm
सुन्दर गीत
सौरभ सर एक निवेदन है कि अंतरे में मुखड़े के साथ गाया जाने वाला हिस्सा यदि अलग पंक्ति में लिखें तो गीत पढ़ने और गुनगुनाने में सहजता होगी|
Comment by विवेक मिश्र on August 19, 2010 at 2:35pm
/आस भरा 'थप-थप' चलता था
’ताता-थइया’ उठ गिरता था/

ये पंक्तियाँ 'नवीन रस' लिए जान पड़ीं.
'क्या बोलूं अब क्या लगता है'... वैसे हर चीज़ बोल कर ही समझाई जाए, ये भी ज़रूरी तो नही..

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 18, 2010 at 9:13pm
आदरणीय सौरभ भाई साहब "क्या बोलूँ अब क्या लगता है?"
बहुत खूब ना बोलकर भी बड़ी दूर की बात बोल दी आपने , धन्यबाद,

कृपया ध्यान दे...

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