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चल रहा है पग पर राही
अकेला है ,अलबेला है
मंद कर तू पग रे राही
अकेला है ,अलबेला है |
कहने को तू मौजी है अल्हड ,बेपरवाह
क्या जल्दी है बोल रे राही
अकेला है ,अलबेला है |
जरा कर पीछे लोचन रे राही
अकेला है ,अलबेला है |
अपने तेरे छुट गए है
क्यों दोस्त क्या तेरे कोई नहीं है
जीवन रस में पग रे राही
क्यों अकेला है ,क्यों अलबेला है ?

......रीतेश सिंह

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 22, 2010 at 9:14am
अच्छी रचना है| लिखते रहे और दूसरो को भी पढ़ें तथा अपनी अमूल्य राय दें|
Comment by ritesh singh on August 21, 2010 at 4:03pm
dhanyabad ganesh ji..

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 21, 2010 at 10:10am
बहुत खूब रितेश सिंह जी, बढ़िया कविता लिखी है आपने, सुंदर रचना , खुबसूरत प्रस्तुति, धन्यवाद,

कृपया ध्यान दे...

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