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वो तो बड़ा अकेला था,

उसको सबने लूटा था,
खुशियों की छाव में भी,
उसने गम ही समेटा था,
वो तो बड़ा अकेला था....
हँसी और किलकारी थी
चहु ओर फुलवारी थी,
सभी ओर तो सावन था,
उसने तो मरू ही देखा था,
वो तो बड़ा अकेला था...
हाथों में तो रोटी थी,
जो उसके जैसी रोती थी,
गम की ठंडी हवा में भी,
सुख को उसने जीर्ण चादर लपेटा था,
वो तो बड़ा अकेला था...
कहने को है शब्द बहुत,
एहसासों का मेला था,
लोग बहुत थे साथ मगर,
उसने दुःख का आलिंगन देखा था,
वो तो बड़ा अकेला था...
छला गया था अपनों से,
ह्रदय भरा था प्रेम रंग से,
अपनों में भी उसने,
अपनों को न पहचाना था,
वो तो बड़ा अकेला था,
वो तो बड़ा अनूठा था,
वो तो बड़ा अकेला था,
सबने उसको लूटा था...

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 26, 2011 at 10:44pm

आपकी रचना पढ़ी हमने. इस प्रयास पर हार्दिक बधाई.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 26, 2011 at 10:00pm
लोग बहुत थे साथ मगर,
उसने दुःख का आलिंगन देखा था,
वो तो बड़ा अकेला था...
आह, बहुत ही दर्द है इस रचना में, योग्यता जी आपने मन के भावों को शब्दों की मोती से बहुत ही सुन्दरता से पिरोया है, अच्छी रचना, बधाई स्वीकार करें |
Comment by आशीष यादव on December 23, 2011 at 5:47pm

sundar bhaw ki rachna hetu badhai.

Comment by Yogyata Mishra on December 23, 2011 at 11:09am

thnx

Comment by Abhinav Arun on December 23, 2011 at 8:53am

अच्छी रचना योग्यता जी हार्दिक बधाई आपको !

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