For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ये तेरी बेरुखी की इंतेहा है या मेरी ख्वाहिशों का कसूर,
आज भी रोने के लिए हम तेरे शाने को तरसते हैं।

...........................................................................

तेरे साथ ही हूँ मगर अब वो एहसास नहीं दिखता,
जो गुदगुदा जाता था मुझे, कभी बस राहों मे तेरे मिल जाने से !

...............................................................................

दिल में सोई हुई तमन्नाओ का इज़हार करके देखो,
ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, किसी से प्यार करके देखो,

क्या हुआ जो एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े,
कभी तो मिलेगी ही मंज़िल, बस तलाश बार-बार करके देखो।

Views: 424

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2012 at 12:31pm

इस सुखद कोशिश के लिये बधाइयाँ.

Comment by Vasudha Nigam on January 16, 2012 at 9:50am

abhaar aap sabhi ka

Comment by Shubhranshu Pandey on January 15, 2012 at 12:50pm

क्या हुआ जो एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े,
कभी तो मिलेगी ही मंज़िल, बस तलाश बार-बार करके देखो।

बहुत खूब. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 14, 2012 at 3:29pm

कहन बढ़िया है, और भी कसने की जरुरत, बधाई |

Comment by Abhinav Arun on January 13, 2012 at 8:55pm

बेहद खूबसूरत अशआर साझा किये आपने आदरणीय वसुधा जी ! हार्दिक बधाई और विस्तारपरक - सशक्त लेखन हेतु हार्दीक शुभकामनाएं !!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 13, 2012 at 11:20am

बहुत खूब.

Comment by Nazeel on January 13, 2012 at 11:09am

बहुत सुंदर रचना ..... हार्दिक बधाई ..:)

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

amita tiwari and आशीष यादव are now friends
8 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर
"मान्यवर  सौरभ पांडे जी , सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार."
8 hours ago
amita tiwari commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"आशीष यादव जी , मेरा संदेश आप तक पहुंचा ,प्रयास सफल हो गया .धन्यवाद.पर्यावरण को जितनी चुनौतियां आज…"
8 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'
"आदरणीय धामी जी सारगर्भित ग़ज़ल कही है...बहुत बहुत बधाई "
14 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार
"आदरणीय सुशील जी बड़े सुन्दर दोहे सृजित हुए...हार्दिक बधाई "
14 hours ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो…"
16 hours ago
आशीष यादव posted a blog post

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे…See More
18 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . . घूस
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत अच्छे दोहे रचे गए हैं।  हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।"
19 hours ago
आशीष यादव commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"एक बेहतरीन ग़ज़ल रचा है आपने। बिलकुल सामयिक।  इस बढ़िया रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
19 hours ago
आशीष यादव commented on amita tiwari's blog post भ्रम सिर्फ बारी का है
"सदियों से मनुष्य प्रकृति का शोषण करता रहा है, जिसे विकास समझता रहा है वह विनास की एक एक सीढ़ी…"
19 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . .अधर
"वाह। "
20 hours ago
आशीष यादव commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .विविध
"आदरणीय श्री सुशील जी नमस्कार।  बहुत बढ़िया दोहों की रचना हुई है।  बधाई स्वीकार कीजिए।"
20 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service