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मुझे सीने से लगाओ या मसल दो मुझको.....

हमनशीं राह पे बस और ना छल दो मुझको,
मुझे सीने से लगाओ या मसल दो मुझको।

मसनुई प्यार से अच्छा है के नफरत ही करो,
शर्त बस ये है के नफरत भी असल दो मुझको।

दिले बीमार ने बस कोने मकाँ माँगा है,
मेरी चाहत ये कहाँ ताजो महल दो मुझको।

मेरे बिगड़े हुए हालात में तुम आ जाओ,
वक़्त ए आखिर है के दो पल तो सहल दो मुझको।

डबडबाई हुई आँखों से न रुखसत करना,
बड़ा लम्बा है सफर खिलते कँवल दो मुझको।

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Comment

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Comment by इमरान खान on August 6, 2012 at 1:05pm

@विपुल भाई ... आपने मेरी ग़ज़ल पर गहरी नज़र डाली
बहुत ही खूबसूरती से आपने मेरी इस्लाह की है... आपकी बताई हुयी हर के बात का आगे से मैं ख्याल रखूंगा ...
दिल की गहराईयों से शुक्रिया आपका .. उम्मीद है के आप आगे भी मेरी इसी तरह इस्लाह फरमाते रहेंगे :))

Comment by Vipul Kumar on June 25, 2012 at 9:47pm

Bahut hi achhi ghazal kahi hai Imran bhai. behad khubsurati se takhayyul ko parvaz di hai. vale kuchh khaamiyaN haiN jinki janib aapka dhyan khenchna chahunga. (2 misroN ki bahr ke baare meN aapko pahle bhi Veenas sahab bata chuke haiN)

मुझे सीने से लगाओ या मसल दो मुझको।

ise yun kar sakte haiN "mujhko seene se lagao"

 

"Asal" aur "sehal" alfaz ko 12 ke wazn par lena shayad sahi nahiN hai. ye alfaz darasl apni mool zabaanoN meN yuN haiN "asl"/"sehl". so inheN 21 par hi liya jana chahiye. (mujhe maloolm nahin k hindi kavya meN inheN 12 par lene ki swatantrata mil gayi hai ya nahiN. lekin shayad aisa nahiN hona chahiye. alfaz apne mool roop meN hi istemal hote haiN. aur deegar shaura ne bhi inheN 21 par liya hai)

 

बड़ा लम्बा है सफर खिलते कँवल दो मुझको।

ise yuN kar sakte haiN "kitna lamba hai safar"

baaqi ghazal bahut umda hai. khuda kare aapka qalam hamesha yuN hi ehsas ki paziiraayi farmata rahe...


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 13, 2012 at 5:14pm

हाँ भाई ! कथ्य और विधा दोनों के लिये.

Comment by इमरान खान on February 13, 2012 at 4:52pm

सौरभ भैया आपके आशीर्वाद के लिए बहुत बहुत शुक्रिया :)

भैया 'संभाल' शब्द क्या अपने बह्र के लिए इस्तेमाल किया है?


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 12, 2012 at 5:59pm

मसनुई प्यार से अच्छा है के नफरत ही करो,
शर्त बस ये है के नफरत भी असल दो मुझको।

बहुत सुन्दर ! बधाई इमरान भाई, इस बेहतरीन संभाल के लिये.

Comment by वीनस केसरी on February 12, 2012 at 2:31pm

मतले का  मिसरा ए सानी और आख़िरी शेर का मिसरा ए सानी पुनः देख लें

बह्र में दो स्वतन्त्र लघु को इस सुंदरता से निभाना काबिलेतारीफ़ है
पुनः बधाई

Comment by इमरान खान on February 12, 2012 at 11:07am

वीनस भाई आपने मेरी इस हकीर सी कोशिश को सराहा मेरे लिए मसर्रतों का मकाम है... लय जहाँ पर भंग हुयी है अगर कुछ इशारा दें तो मेरे लिए मिसरों को सुधारने में आसानी हो जाएगी...

बरा ए मेहरबानी बह्र के पेचीदा होने पर भी कुछ रोशनी डाल दीजिये ..

Comment by इमरान खान on February 12, 2012 at 11:03am

AVINASH  भाई बहुत बहुत शुक्रिया हौसला अफजाई के लिए :)

Comment by वीनस केसरी on February 11, 2012 at 10:41pm

इमरान जी
ग़ज़ल में सुन्दर भाव के साथ पेचीदा बह्र का पालन किया गया है
हार्दिक बधाई

कुछ मिसरों में लय भंग होती महसूस हुई, यदि नजर-ए-सानी कर लें तो ग़ज़ल और निखर जायेगी
सादर

Comment by AVINASH S BAGDE on February 11, 2012 at 12:37pm
मसनुई प्यार से अच्छा है के नफरत ही करो,
शर्त बस ये है के नफरत भी असल दो मुझको। what a SHER..Wah Imran bhai..nice gazal.

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