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हर सुंदर

प्रभात वेला में

प्रतिदिन

मैं पाता हूँ

स्वयं को

सीलन भरी लकड़ी सा

जो चाहती है

सुलगना

और...

सुलगना भी

इस तरह की

उसमें होम हो जाए

सीलन .

सीलन अहम् की

बहुत सारे 

भ्रम की

मेरी हमसफ़र !

आओ ...

पवित्र अग्नि में

प्यार की .

भस्म कर दें

सीलन

हृदयों के

संसार की .

.

.

करोगी स्वीकार ?

मेरा निमंत्रण !!

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Comment

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on March 3, 2012 at 12:34pm

सारगर्भीत रचना पर बधाई 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 3, 2012 at 10:51am

बहुत सुन्दर भाव. बधाई डॉ अजय जी.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 2, 2012 at 11:04pm

डा. अजयजी, आपके प्रस्तुत रचना में भाव-पक्ष को बेहतरशब्द मिले हैं.  अपेक्षा है, आप पद्य शिल्प-पक्ष पर भी आप उचित ध्यान दें.

शुभेच्छा .. .

Comment by Dr Ajay Kumar Sharma on March 2, 2012 at 12:30pm

सभी माननीय मित्रों व द्वारा प्रेषित प्रेरणाप्रद भावों का हृदय से आभार ...इन शब्दों के साथ
तेरी याद.
पंछी की
स्वच्छंद उड़ान.
तेरे आंसू
सुनामी में उजड़ता
सपनों का बागान .
डा अजय कुमार शर्मा ..

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 2, 2012 at 12:10pm

सुन्दरतम भावों की अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई डॉ. साहब| साभार,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 2, 2012 at 11:41am

bahut umda bhaav atiuttam....vaah...badhaai sweekaren.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 2, 2012 at 11:32am

सीलन अहम् की

बहुत सारे 

भ्रम की

मेरी हमसफ़र !

आओ ...

पवित्र अग्नि में

प्यार की .

भस्म कर दें

sundar bhav, badhai.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 2, 2012 at 10:19am

शानदार !!!!!! बहुत ही प्यारी रचना , सीधे ह्रदय को स्पर्श करती हुई , बहुत बहुत बधाई डाक्टर साहब इस बेहतरीन अभिव्यक्ति हेतु |

कृपया ध्यान दे...

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