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मैनें कहा

कुछ और नहीं

सिर्फ वो ही

जो युगों से

सहा था...

सहा था फूलों नें

ख्वाबों में लहराते

सावन के झूलों नें

उन शब्दों नें

जो आ न पाए

लबों पर तुम्हारे ही

ज़ुल्मों से ...

सहा था उस प्यासे नें...

जो दम तोड़ गया

समंदर में रह कर

पर छू न पाया

पानी को जुबान से कभी.

सहा था उन पलकों नें...

जो युगों से भरी हैं

अनमोल मोतियों से

आतुर हैं

छलकने को

पर रुके हैं

किसी के नाम की

रुसवाई रोकने को .

पता है मुझे

तुम्हारे कमज़ोर

पहरे की ताकत !

जो लग नहीं सकता

उन धडकनों पर

जो धड़कती है

एक दूसरे से ही

साथ साथ !

साथ साथ ! !

दे कर

शाह और मात

तुम्हारे पहरे को.

देखो तो दर्पण में

अपने चेहरे को

जो हो चुका है विकृत

विरोध करके

अपने अंतर्मन

की आवाज़ का

सत्य व प्रेम

की आगाज़ का...

रचयिता : डा अजय कुमार शर्मा

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Comment

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Comment by Dr Ajay Kumar Sharma on March 14, 2012 at 11:21am

आदरणीय सर्व श्री सौरभ पाण्डेय जी , संदीप दिवेदी जी , प्रदीप कुशवाहा जी तथा  आदरणीया श्रीमती राजेश कुमारी जी ...हृदय से आभार ..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 13, 2012 at 7:55pm

डाक्टर साहब !! इस अभिव्यक्ति पर मेरा सादर वन्दन लें.  प्रवाह के विरुद्ध कुछ भी एक जकड़न है. हर बिम्ब सामान्य वस्तुओं का प्रतिबिम्ब है, लेकिन प्रयुक्त हुए तो क्या ज़ादुई अनुभूति होती है.  वैसे तो हर इंगित आलोड़न-सा मचा देता है, लेकिन स्व-अंकुश की परिणति  -

देखो तो दर्पण में
अपने चेहरे को
जो हो चुका है विकृत
विरोध करके
अपने अंतर्मन
की आवाज़ का
सत्य व प्रेम
की आगाज़ का...  

वाह ! वाह !! वाह !!!

हार्दिक बधाई.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 13, 2012 at 1:55pm

मनोहारी कविता डॉ. साहब| भावपूर्ण अभिव्यक्ति|

Comment by Dr Ajay Kumar Sharma on March 13, 2012 at 11:07am

धन्यवाद .

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 13, 2012 at 10:15am

बहुत सुन्दर भाव पूर्ण अभिव्यक्ति. बधाई.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 13, 2012 at 8:00am

shaandar bhaavabhivyakti Ajay ji.

कृपया ध्यान दे...

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