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ये भारत देश हमार है

शस्य  श्यामला  धरती  अपनी   

भाल    हिमालय  मुकुट  श्रंगार  है 

झर  झर  झरते  झरने  मही  पर

कल  कल  बहती  नदियों  की  बहार  है 

ये   भारत  देश  हमार   है 

 

कई  सम्प्रदायों  से  बसी   ये  धरती

 पर  करते  आपस  में   प्यार  है 

भाषा  बदले  भूषा  बदले  

आपस  में  न  कोई  तकरार  है 

ये  भारत  देश  हमार  है 

मानव  धर्म  सबसे  हसीं 

इंसानियत  का   व्यवहार  है 

होली  हो  या  ईद  दीवाली  

पर्व  दशहरा  सबका  ये  त्यौहार  है 

ये  भारत  देश  हमार  है 

 

 

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Comment by Saurabh Pandey on March 21, 2012 at 9:17pm

रचना में प्रयुक्त शब्द ’हमार’ में अंतर्निहित अभिभूत करती आत्मीयता को मेरा सादर नमन. आदरणीय प्रदीपजी, शस्य श्यामला मनोहारी इस भारत भूमि का कण-कण अभिजात्य रहा है. कहना अन्यथा न होगा, इसकी ऊर्जस्विता में दीखती अवनति के कारक मनस से विछिन्न हम संतति ही हैं. 

आपके स्वर में हम भी स्वर मिला कर कहते हैं, भारतपुत्रों को सद्बुद्धि मिले.

सादर

Comment by Dr. Shashibhushan on March 21, 2012 at 8:51pm

आदरणीय प्रदीप भैया,
सादर !
आप तो बिलकुल ताल ठोक कर तैयार हैं ! नमन के साथ मेरी भी ललकार !
.
"ओ कलुषित विचार वालों सुन लो तुम ध्यान लगाकर !
सत्यमार्ग के पथिक न डिगते, बाधा से घबरा कर !
सहज प्रेम की नयी किरण के स्वागत को तैयार हैं !
शस्य-श्यामला धरती अपनी, भारत देश हमार है !!"
वन्दे मातरम् !!!

Comment by minu jha on March 21, 2012 at 7:54pm

बहुत सुंदरता से आपने अनेकता में एकता के भावों को समेटा है कुशवाहा जी

बहुत बहुत बधाई

Comment by अश्विनी कुमार on March 21, 2012 at 3:51pm

अति सुंदर अनेकता में एकता की नींव को और गहरे तक ले जाने का प्रयाश करती हुई रचना .....सादर ..."जय भारत" 

Comment by Santosh Kumar Singh on March 20, 2012 at 6:42pm

Comment by Santosh Kumar Singh on March 20, 2012 at 6:42pm

आदरणीय सर ,सादर प्रणाम
बहुत अच्छी रचना ,अनेकता में एकता है और एकता में भी अनेकता है ,..इस एकता को खंडित करने के प्रयास हो रहे हैं हमें उनको रोकना होगा ..बहुत बधाई

Comment by Santosh Kumar Singh on March 20, 2012 at 6:37pm

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 20, 2012 at 6:18pm

आदरणीय प्रदीप जी,

कुछ हद तक देश की विविधता को समेटे हुए आपकी यह रचना बहुत ही सुंदर बन पड़ी है| बधाईयां!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2012 at 5:08pm

aadarniya shahi ji, saadar abhivadan. sneh hetu aabhari hun. 

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