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मुक्तिका: संजीव 'सलिल'
*
लफ्ज़ लब से फूल की पँखुरी सदृश झरते रहे.
खलिश हरकर ज़िंदगी को बेहतर करते रहे..

चुना था उनको कि कुछ सेवा करेंगे देश की-
हाय री किस्मत! वतन को गधे मिल चरते रहे..

आँख से आँखें मिलाकर, आँख में कब आ बसे?
मूँद लीं आँखें सनम सपने हसीं भरते रहे..

ज़िंदगी जिससे मिली करते उसीकी बंदगी.
है हकीकत उसी पर हर श्वास हम मरते रहे..

कामयाबी जब मिली सेहरा सजा निज शीश पर-
दोष नाकामी का औरों पर 'सलिल' धरते रहे..

****
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on April 23, 2012 at 6:27am

bhaee kushwaha jee!

gadhon ko charane se rokane ke liye anna ke sath juda jae.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 20, 2012 at 4:08pm

सादर बधाई आचार्यवर.  मुक्तिका की सुन्दर प्रस्तुति.

चुना था उनको कि कुछ सेवा करेंगे देश की-
हाय री किस्मत! वतन को गधे मिल चरते रहे.. ..    कहन से अद्भुत इस बंद को लागू बह्र पर ही रहने दिया होता न.

Comment by Sarita Sinha on April 20, 2012 at 2:03pm

आदरणीय सलिल जी नमस्कार  ,

कामयाबी जब मिली सेहरा सजा निज शीश पर-
दोष नाकामी का औरों पर 'सलिल' धरते रहे..

बहुत लाजवाब व्यंग्य .बधाई.........

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 20, 2012 at 10:53am

वाह वाह कटाक्ष मारती हुए मुक्तक सलिल जी कोई जबाब नहीं 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 19, 2012 at 5:31pm

चुना था उनको कि कुछ सेवा करेंगे देश की-
हाय री किस्मत! वतन को गधे मिल चरते रहे..

aadarniya salil ji, saadar abhivadan.

bahut sundar bhav evam prastuti. ab kya kiya jaye. 

badhai.

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