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भक्षक (लघु कथा )

 साहब मेरी बेटी कहाँ है ?हरिया ने हाथ जोड़कर स्थानीय   थाने में बैठे दरोगा से गिड़ गिडाते हुए पूछा |अब होश आया तुझे दो दिन हो गये तेरी बेटी को नहर से निकाला था,हाँ आत्महत्या का प्रयास करने से पहले तेरे पास भी तो आई थी अपनी  ससुराल वालो के अत्याचार का दुखड़ा रोने करी थी क्या तूने उसकी  मदद ,अब आया बेटी वाला |आत्म हत्या भी जुर्म है केस चलेगा अभी लाकअप में बंद है कल आना वकील के साथ लिखत पढ़त करके छोड़ देंगे|पर साहब इन कोठरियों में तो दिखाई नहीं !!!उसकी बात पूरी होने से पहले ही दरोगा ने पास खड़े सिपाही से कहा इसे बाहर तो छोड़ के आ | फिर दूसरे सिपाही को बुलाकर धीरे से  बोला जा  पीछे के दरवाजे से लाकर उसे लाकअप  में डाल दे |येस सर कह कर फिर ठिठकते हुए धीरे से  सिपाही बोला सर अपने घर की चाबी तो दे दीजिये पहले !!!       

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 3, 2012 at 9:35am

वीनस जी हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 3, 2012 at 9:34am

अशोक कुमार जी आप सही कह रहे हैं जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो कहाँ जाएँ 

Comment by वीनस केसरी on May 2, 2012 at 11:15pm

राजेश कुमारी जी
भक्षक समाज का असली चेहरा दिखाती हुई लघु कथा अपने उद्देश्य को पूरा कर रही है

बधाई स्वीकारें

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 2, 2012 at 11:06pm

जब एक गुंडा सांसद बन देश की सर्वोच्च संस्था की मर्यादा धूमिल करता है और कहता है हम तो चुन कर आये हैं. तो फिर किसी पुलिस वाले को कहने का अर्थ ही क्या? चाहे लाकप हो, ट्रेनिग सेंटर हो या सूनी राहें. पुलिस का स्तर यही रहेगा.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 30, 2012 at 6:02pm

महिमा श्री जी बिलकुल   सही कहा इनकी तो जितनी कब्र खोदो उतनी ही अधिक दुर्गन्ध आएगी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 30, 2012 at 6:00pm

आशीष यादव जी बेहतरीन कटाक्ष एक शब्द में ...वाह ...यही हो रहा है 

Comment by MAHIMA SHREE on April 30, 2012 at 5:55pm
आदरणीया राजेश दी ,
पुलिसिया अनाचार की एक और बानगी आपकी कथा में देखने को मिली ..
बधाई स्वीकार करें
Comment by आशीष यादव on April 30, 2012 at 5:49pm

दूध की रखवाली बिल्ली कर रही है।
सामयिक संवेदनात्मक व्यंग।
बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 30, 2012 at 5:39pm

शलेन्द्र कुमार जी यह एक कटु सत्य है कुर्सी के घमंड  में  लोगों की विकृत मानसिकता का द्रश्य है 

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 30, 2012 at 5:15pm

संवेदना से परिचय कराती लघु कथा हार्दिक बधाई स्वीकार करें मैम

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