For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दफ़्तर के काम में डूबा हुआ था मैं
अचानक किसी शब्द से चिपकी चली आई तुम्हारी याद
जैसे ढेर सारे ठंढे सांद्र अम्ल में गिर जाय एक बूँद पानी
और उत्पन्न हुई ढेर सारी ऊष्मा
पानी की तैरती बूँद को झट से उबाल दे
अम्ल छलक पड़े बाहर
कुछ मेरे कपड़ों पर
कुछ मेरे चेहरे पर
यूँ अचानक मत आया करो
मेरे भीतर का अम्ल मुझे जला देता है
मैं खुद आउँगा कतरा कतरा तुम्हारे पास
जैसे ढेर सारे पानी में खो जाता है बूँद बूँद अम्ल
पानी समेट लेता है अम्ल की हर बूँद अपने भीतर

और जज्ब कर लेता है सारी ऊष्मा

Views: 581

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 6, 2012 at 9:15pm

आदरणीय योगराज जी, संदीप जी, राजेश कुमारी जी, महिमा जी, अरुण जी, गणेश जी, सौरभ जी, भवेश जी एवं कुमार गौरव जी आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on May 6, 2012 at 5:18pm

धर्मेन्द्र सर, एक बेहद अच्छी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें.

Comment by Bhawesh Rajpal on May 6, 2012 at 2:43pm
बहुत अच्छे  ! बधाई  ! 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 5, 2012 at 9:04pm

यूँ अचानक मत आया करो
मेरे भीतर का अम्ल मुझे जला देता है
मैं खुद आउँगा कतरा कतरा तुम्हारे पास
जैसे ढेर सारे पानी में खो जाता है बूँद बूँद अम्ल
पानी समेट लेता है अम्ल की हर बूँद अपने भीतर
और जज्ब कर लेता है सारी ऊष्मा 

अद्भुत भाव-रचना, अद्भुत शब्द संयोजन !! .. हार्दिक बधाई !!!


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 5, 2012 at 8:58pm
दफ़्तर के काम में डूबा हुआ था मैं, अचानक किसी शब्द से चिपकी चली आई तुम्हारी याद, जैसे ढेर सारे ठंढे सांद्र अम्ल में गिर जाय एक बूँद पानी और उत्पन्न हुई ढेर सारी ऊष्मा |
बहुत खूब, नये बिम्ब के साथ  उत्पन्न इस अभिव्यक्ति पर बधाई |
Comment by Abhinav Arun on May 5, 2012 at 7:55pm

सुन्दर भावपूर्ण रचना श्री धर्मेन्द्र जी !!

Comment by MAHIMA SHREE on May 5, 2012 at 2:44pm
मेरे भीतर का अम्ल मुझे जला देता है
मैं खुद आउँगा कतरा कतरा तुम्हारे पास
जैसे ढेर सारे पानी में खो जाता है बूँद बूँद अम्ल
पानी समेट लेता है अम्ल की हर बूँद अपने भीतर..
आदरणीय धर्मेन्द्र सर ..
बहुत -२ बधाई आपको इस खुबसूरत कविता के लिए

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 5, 2012 at 1:32pm

वाह क्या बात है धर्मेन्द्र जी रसायन शास्त्र में लिपटे जज्बात और सुन्दर शब्द कभी आपकी कविता गणित की चादर  में लिपटी होती है नए नए सामयिक प्रयोग वाह ...बहुत ही खूबसूरत भाव जो कविता पूर्णतः कहने में सक्षम है ..बधाई आपको 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 5, 2012 at 12:58pm

यूँ अचानक मत आया करो

मेरे भीतर का अम्ल मुझे जला देता है
मैं खुद आउँगा कतरा कतरा तुम्हारे पास
बहुत सुन्दर ,कितनी    सरलता से गंभीर बात  बधाई.

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 5, 2012 at 11:04am

//यूँ अचानक मत आया करो

मेरे भीतर का अम्ल मुझे जला देता है//
क्या कहने हैं धर्मेन्द्र भाई जी, वाह. इस कहते हैं खुली कविता, को छन्दमुक्त होने के बावजूद भी झरने की सी रवानी से लबरेज़ है. बधाई स्वीकार करें बंधुवर. 
.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post आदमी क्या आदमी को जानता है -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई रवि जी सादर अभिवादन। गजल पर आपकी उपस्थिति का संज्ञान देर से लेने के लिए क्षमा चाहता.हूँ।…"
17 hours ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी.  आपका हार्दिक धन्यवाद "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी "
yesterday
Ashok Kumar Raktale posted blog posts
yesterday
Chetan Prakash commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ
"नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता…"
yesterday
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय जी । "
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . क्रोध
"आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । इंगित बिन्दु पर सहमत…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजलपर उपस्थिति और सप्रेमं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार। इसे बेहतर…"
Thursday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service