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पुरखों के कुँए को ही दुनिया समझना
कूप मंडूकता है

कुँए को अपना घर समझना
पाँवों में पड़ी बेड़ियाँ हैं

कुँए की दीवारों को अभेद्य समझना
खुद को खुद की नज़रों में
दुनिया का विजेता साबित करने की कोशिश है

खुद को विश्व विजयी समझना
चुनौतियों से हारकर आलस्य का जहर पीना है

खुद को कूप मंडूक समझना
बाहर की रोशनी का अहसास है

कुँए की दीवारों के बाहर दुनिया की कल्पना
कुँए से बाहर जाने वाली सुरंग है

दुनिया के बाहर दुनिया की कल्पना
कुँए से बाहर जाने वाली सीढ़ी है

कुँए की दीवारों पर प्रश्नचिह्न बनाना
कुँए को पाटने वाली मिट्टी है

हम सब कूप मंडूक हैं
फर्क सिर्फ इतना है
कि किसके पास कितनी रोशनी, कितनी सुरंगें
कितनी सीढ़ियाँ और कितनी मिट्टी है

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 6, 2012 at 9:13pm

प्रदीप जी बहुत बहुत शुक्रिया इस स्नेह के लिए

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 5, 2012 at 5:04pm

हम सब कूप मंडूक हैं
फर्क सिर्फ इतना है
कि किसके पास कितनी रोशनी, कितनी सुरंगें
कितनी सीढ़ियाँ और कितनी मिट्टी है

bahut badhiya kathan aapka. badhai, sir ji. 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 5, 2012 at 12:19am

आशीष जी, सौरभ जी, सीमा जी, सतीश जी, अविनाश जी, राजेश कुमारी जी एवं महिमा जी रचना को इतना प्यार देने  के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by MAHIMA SHREE on May 4, 2012 at 5:33pm
दुनिया के बाहर दुनिया की कल्पना
कुँए से बाहर जाने वाली सीढ़ी है

कुँए की दीवारों पर प्रश्नचिह्न बनाना
कुँए को पाटने वाली मिट्टी है..आदरणीय धर्मेन्द्र सर ,
हम कूप मडुक की बधाई स्वीकार करें :)

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 4, 2012 at 11:15am

 मस्तिष्क कि तंत्रिकाओं को जगा देने वाली कविता |

Comment by AVINASH S BAGDE on May 4, 2012 at 10:45am

खुद को कूप मंडूक समझना

बाहर की रोशनी का अहसास है



कुँए की दीवारों के बाहर दुनिया की कल्पना

कुँए से बाहर जाने वाली सुरंग है


हम सब कूप मंडूक हैं
फर्क सिर्फ इतना है
कि किसके पास कितनी रोशनी, कितनी सुरंगें
कितनी सीढ़ियाँ और कितनी मिट्टी है....धर्मेन्द्र कुमार सिंह ...behad prabhavi rachana...sadhuwad.

Comment by satish mapatpuri on May 4, 2012 at 3:48am

हम सब कूप मंडूक हैं

 फर्क सिर्फ इतना है

कि किसके पास कितनी रोशनी, कितनी सुरंगें

 कितनी सीढ़ियाँ और कितनी मिट्टी है     

अहो नाथ अब नहीं कुछ  बाकी ........... सब तो कह दिया हुज़ूर ........ तो फिर बधाई स्वीकार कीजिये

 

      


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 4, 2012 at 12:09am

कविता भाषण की तरह होती
या किसी निबंध की तरह
या फिर,
अनायास प्रस्फुटित हुए ज्ञान की तरह.. .
एक बार हो गयी तो होती चली जाती
और समस्त को समेटे अपने उपसंहार में
सायास समाप्त होती .. .
कविता के काश पंख न होते
उड़ान न होती.
निठल्ली पड़ी होती कुओं में.. मोरी में..  किसी गब्दू मेढक की तरह.. ढापुस-ढापुस टर्राती हुई.. .

और हम उसके गलफड़ों के गुब्बारों से निकले सुर पर स्वर न साधते.

 

भाई धर्मेन्द्र जी, आपकी रचनाएँ इतनी इन्डक्टिंग क्यों होती हैं ? ..  हृदय से बधाई.

Comment by आशीष यादव on May 3, 2012 at 11:03pm

bilkul sahi vichaaron me kavita likhi hai aapne.

badhai swikaarein.

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