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ग़ज़ल : है मरना डूब के मेरा मुकद्दर भूल जाता हूँ

है मरना डूब के मेरा मुकद्दर भूल जाता हूँ
तेरी आँखों में भी है एक सागर भूल जाता हूँ

ये दफ़्तर जादुई है या मेरी कुर्सी तिलिस्मी है
मैं हूँ जनता का एक अदना सा नौकर भूल जाता हूँ

हमारे प्यार में इतना तो नश्शा अब भी बाकी है
पहुँचकर घर के दरवाजे पे दफ़्तर भूल जाता हूँ

तुझे भी भूल जाऊँ ऐ ख़ुदा तो माफ़ कर देना
मैं सब कुछ तोतली आवाज़ सुनकर भूल जाता हूँ

न जी सकता हूँ तेरे बिन, न मरने दे तेरी आदत
दवा हो या जहर दोनों मैं रखकर भूल जाता हूँ

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Comment

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 22, 2012 at 5:54pm

बहुत बहुत शुक्रिया राणा भाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on April 22, 2012 at 1:33pm

बहुत खूब धर्मेन्द्र भैया

सारे शेर कमाल के है..कई दिनों बाद नगीना हाथ लगा है| ढेर सारी दाद कबूलिये|

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 22, 2012 at 1:19am

वीनस जी, राजेश कुमारी जी, बागी जी, प्रदीप जी, सौरभ जी, संदीप जी, महिमा जी एवं वंदना जी इस असीम प्यार एवं उत्साहवर्द्धन के लिए आप सबका हृदय से धन्यवाद

Comment by MAHIMA SHREE on April 21, 2012 at 3:03pm
ये दफ़्तर जादुई है या मेरी कुर्सी तिलिस्मी है
मैं हूँ जनता का एक अदना सा नौकर भूल जाता हूँ......

वाह !!! सर क्या बात कही ..इतने कम शब्दों में आपने नेताओं की कुर्सी प्रेम का असली कारण बता दिया :)
हरेक पंक्तिया लाजवाब ..बधाई आपको
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 21, 2012 at 1:17pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी,

वाह-वाह, बहुत ख़ूब, क्या बात है!! इससे ज़्यादा कुछ कहना मेरे वश में नहीं है| साभार,


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 21, 2012 at 1:02pm

वाह भाई वीनस जी.. .   :-)))))

यह भी चस्पाँ कर देना था  .. और परियोजना पूरी हुई..   हा हा हा हा हा हा ...................

खैर मज़ाक अलग .. आपका अंदाज़ प्यारा लगा .. मैं भी अपनाऊँगा.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on April 21, 2012 at 12:58pm

लीजिये इस ग़ज़ल को मैं अभी ओबीओ पर देख पा रहा हूँ. अच्छा हुआ कि यह यहाँ दिख गयी. वर्ना इन्हीं मिसरों पर अन्य सामाजिक पटल पर वाह-वाह करने के क्रम में मैं खुद में खौल रहा था.     :-))))))

बहुत बहुत बधाई कह चुका हूँ.

ये दफ़्तर जादुई है या मेरी कुर्सी तिलिस्मी है
मैं हूँ जनता का एक अदना सा नौकर भूल जाता हूँ  ....    इस शे’र की तासीर पर हज़ार मुबारकें.. ..

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 21, 2012 at 11:21am

तुझे भी भूल जाऊँ ऐ ख़ुदा तो माफ़ कर देना
मैं सब कुछ तोतली आवाज़ सुनकर भूल जाता हूँ 

bahut sundar gajal. bahut sundar andaj  sir ji badhai. aanand aa gaya.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 21, 2012 at 10:18am

हमारे प्यार में इतना तो नश्शा अब भी बाकी है
पहुँचकर घर के दरवाजे पे दफ़्तर भूल जाता हूँ

वाह वाह, जबरदस्त, बहुत ही उम्दा ख्याल धर्मेन्द्र जी, सभी शेर बहुत ही प्यारे लगे, कुल मिलाकर एक शानदार ग़ज़ल, दाद कुबूल करें |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 21, 2012 at 7:44am

वाह धर्मेन्द्र जी अपनी आदत को खूबसूरत ग़ज़ल की शक्ल दे डाली आपने इन खूबसूरत आदतों और खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई |

कृपया ध्यान दे...

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