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भीड़...अजय कुमार बहोत

मैं
भीड़ हूँ
इस लोकतंत्र के ढाँचे की मैं रीढ़ हूँ
जी हाँ
मैं भीड़ हूँ...

तिनका-तिनका जोड़ता दिन का
रोज़ बिखरता-जुड़ता
मन-आशाओं का नीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

कहाँ फुर्सत
वैष्णव-जन को,
की जाने मुझ को
एक परायी पीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

~ © AjAy Kum@r

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Comment

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Comment by AjAy Kumar Bohat on May 13, 2012 at 7:39pm

bahut bahut shukriya, Sandeep ji, Dubey ji, Arun  kumar ji....

main abahari hoon apka, apki hausla afzahi ka.

Comment by Abhinav Arun on May 13, 2012 at 7:28pm

कहाँ फुर्सत
वैष्णव-जन को,
की जाने मुझ को
एक परायी पीड़ हूँ
मैं भीड़ हूँ...

बहुत बहुत सशक्त रचना !! लोकतंत्र में आज लोक की पीड़ा झलक रही है इस रचना में हार्दिक बधाई श्री अजय जी !!

Comment by Ajay Kumar Dubey on May 12, 2012 at 1:26pm

बहुत ही सुन्दर रचना.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 11, 2012 at 8:01pm

bahut sundar ..........

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 11, 2012 at 7:03pm

बहुत बहुत धन्यवाद महिमा जी, बागी जी, सौरभ जी, भावेश जी और राजेश जी,

मैं  हृदय से आभारी हूँ की आपको रचना पसंद आई....

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 11, 2012 at 5:13pm

बहुत ही प्यारी सशक्त रचना 

Comment by Bhawesh Rajpal on May 11, 2012 at 4:11pm

Nice !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 11, 2012 at 4:01pm

इस कविता ’भीड़’ हेतु बधाई, अजय जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 11, 2012 at 3:58pm

जिस दिन यह भीड़ अपने को लोकतंत्र की रीढ़ समझ ले उस दिन से देश का काया ही सुधर जाये , खुबसूरत रचना हेतु बधाई अजय जी |

Comment by MAHIMA SHREE on May 11, 2012 at 3:51pm
आदरणीय अजय जी ..
बहुत ही सशक्त रचना ... बधाई स्वीकार करें .

कृपया ध्यान दे...

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