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गहरा है ये सागर बहुत साहिल ही नही है

ये दिल मेरा अब इश्क के काबिल ही नहीं है
बिखरा है जो अब टूट के वो दिल ही नहीं है

हम जीते थे जिस शान से यारों के साथ में
वो छूटे हैं पीछे सभी महफ़िल ही नहीं है

गम हैं मेरा जो जान से मारेगा  एक दिन
जो गम को डाले मार वो कातिल ही नहीं है

नादानी थी या भूल थी आशिक मैं बन गया
क्या आँखों को उसकी पढ़ें कामिल ही नहीं है

मैं डूबा था इस इश्क में पाने को कुछ सकूँ
गहरा है ये सागर बहुत साहिल ही नही है

है कैसा ये निजाम दीप लुट रहा हर सख्स
इतना मेरा कानून तो ग़ाफिल ही नहीं है !!!!!!

संदीप पटेल "दीप"

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Comment by Bishwajit yadav on June 3, 2012 at 10:54pm
ये दिल मेरा अब इश्क के काबिल ही नहीं है
बिखरा है जो अब टूट के वो दिल ही नहीं है

वाह वाह क्या बात है बहुत सुन्दर संदपी जी क्या बात है

मुझे उम्मीद है कि आप और भी नई रचनाओ को पोस्ट करेगे और थोडा शब्दो पर भी ध्यान दे
जय हो
Comment by chandan rai on June 3, 2012 at 4:32pm
सदीप जी
नादानी थी या भूल थी आशिक मैं बन गया
क्या आँखों को उसकी पढ़ें कामिल ही नहीं है

खुबसूरत ग़ज़ल , बधाई हो
Comment by Rekha Joshi on June 2, 2012 at 9:11pm

सदीप जी ,बहुत बढ़िया रचना ,लिखते रहे ,बधाई \

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2012 at 8:20pm

जय गुरुदेव
सादर नमन आपको आदरणीय Saurabh Pandey सर जी
आपकी प्रतिक्रया पा के मैं धन्य हो गया,  एक विश्वास जागा कि हम भी कुछ लिख सकते हैं
इस उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया और सादर आभार
ये स्नेह और आशीर्वाद यूँ ही बनाये रखिये


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 2, 2012 at 7:48pm

आपने अच्छी कोशिश की है, भाईजी.  इस ग़ज़ल पर बधाई कुबूल करें.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2012 at 6:39pm

आदरणीय Ganesh Jee "Bagi" सर जी सादर नमन
आपको ग़ज़ल पसंद आई इसका मतलब ये ग़ज़ल ही है
इसमें जो कमियाँ हों उन्हें भी उजागर करने की कृपा करें ताकि अगली बार और अच्छा प्रयास किया जा सके
आपका बहुत बहुत आभारी हूँ
अपने ये स्नेह बनाये रखिये
सादर नमन

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 2, 2012 at 6:37pm


आदरणीय सम्पादक  महोदय जी सादर नमन
आपका आदेश सर आँखों पर
अब से यही कोशिश रहेगी
आपका आभारी


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 2, 2012 at 5:51pm

//गम हैं मेरा जो जान से मारेगा  एक दिन
जो गम को डाले मार वो कातिल ही नहीं है//

सभी शेर अच्छे लगे, ग़ज़ल खुबसूरत है, बधाई हो संदीप जी |

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 2, 2012 at 5:14pm

है कैसा ये निजाम दीप लुट रहा हर सख्स 
इतना मेरा कानून तो ग़ाफिल ही नहीं है 

इसी गफलत में तो जीता रहा ता उम्र ऐ दोस्त 

न आई हया उनको देखा उनकी आँख में पानी ही नहीं है 

था जोश बहुत उनकी बाजुओं में लड़ने का तुफानो से 

आया वक्त जब हिसाब का देखा उनमे जवानी ही नहीं है 

बधाई  .

Comment by Admin on June 2, 2012 at 10:56am

संदीप जी, प्रयास करें कि टिप्पणी देवनागरी (हिंदी) में हो , देवनागरी लेखन हेतु टूल लिंक ओ बी ओ में दिया गया है, यदि रोमन लिखना ही पड़े तो Running लिखे अर्थात कैपिटल में ना लिखे । 

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