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सांसे जब तक चलती हैं

तब तक चलता है

सुख- दुःख का एहसास 

मान -अपमान की पीडाएं 

उंच -नीच , जात -पात  का भेद

सम्पन्नता -विपन्नता का आंकलन

नहीं मिलने मिलाने के उलाहने

प्रतियोगिता की अंधी दौड़

एक दुसरे को मिटा डालने का षड़यंत्र

सांसे जब तक टूटती हैं

उस क्षण को

ग्लानी से भरता है मन

और छोड़ देता है तन को

बची रह जाती है

उसकी कुछ यादें

अंततः कुछ भी नहीं बचता शेष

और फिर से शुरू हो जाती हैं

ये सारी प्रवंचनाएं

23july2008

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 4, 2012 at 9:56am

 

बहुत सुन्दर रचना सुश्री महिमा जी..

सांसे जब तक चलती हैं

तब तक चलता है

सुख- दुःख का एहसास 

मान -अपमान की पीडाएं 

उंच -नीच , जात -पात  का भेद

सम्पन्नता -विपन्नता का आंकलन

.....................................................बहुत सुन्दर रचना

अध्यात्मिकता को स्पर्श करने का प्रयत्न करती कृति.

.....................साँसे जब तक चलती हैं ( साँसे जब तक असम्यक चलती हैं) सिर्फ तभी तक रहता है सुख-दुःख का एहसास...

उसके आगे द्वैत भाव समाप्त होने लगता है, और अद्वैत का अनुभव होना शुरू होता है. जहां सिक्के के दो पहलुओं में कोई भेद नहीं, बल्कि एक सुखकारी सामंजस्य होता है...

इस कृति के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 4, 2012 at 7:11am

behad khoobsoorati ke saath dil ko shabdon me ukera hai aapne is rachna ke liye saadhuwaad

Comment by arunendra mishra on June 3, 2012 at 11:33pm

सांसे जब तक चलती हैं

तब तक चलता है

सुख- दुःख का एहसास 

मान -अपमान की पीडाएं 

..सुन्दर रचना ..!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 3, 2012 at 11:20pm

बहुत दार्शनिकता ,सच्चाई से रूबरू कराती रचना ...वाह ..वाह बहुत सुन्दर 

Comment by MAHIMA SHREE on June 3, 2012 at 10:55pm

आदरणीय उमाशंकर जी .. आपका हार्दिक धन्यवाद , स्नेह बनाये रखे

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 3, 2012 at 10:48pm

महिमा श्री जी आपने तो कविता  में

दर्शन भर दिया है| इस अध्यात्मिक रचना के लिए हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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