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तीक्ष्ण और पवित्र बुद्धि 

तीक्ष्ण बुद्धि है कारगर, संसारी कांवे-दावे* में
क्षीण हो जाती है यह, सांसारिक भटकाव में |
 
तीक्ष्ण बुद्धि नहीं कारगर, परम पिता को पाने में,
पवित्र बुद्धि ही चाहिए, प्रभु से लगन लगाने में |
 
मात्र पढाई नहीं कारगर, पवित्र बुद्धि को पाने में, 
व्रत-उपवास सत्संग चाहिए, पवित्र बुद्धि को पाने में |
 
वाल्मीकि,तुलसी औ सूर नहीं थे उच्च शिक्षित 
उनकी पवित्र बुद्धि से लिखित,पढ़ते उछ शिक्षित |
 
*कांवे-दावे अर्थात चाले
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 6, 2012 at 4:53pm

 स्नेहिल श्री योगराज प्रभाकरजी,

मैंने तो सदगुरू से सुनी कथा के बनाए नोट के सारतत्व को 
काव्यात्मक  रूप देने का प्रयास भर ही किया है, इससे अगर 
सार्थक सन्देश मिल रहा है, और आप जैसे मनीषी द्वारा  
उत्साह वर्धन करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है | आपका 
बहुत बहुत आभार | 

 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 5, 2012 at 8:02pm

श्री लड़ीवाला जी बहुत सुन्दर और सार्थक सन्देश दे रही हैं आपकी यह द्विपदियाँ, हार्दिक साधुवाद स्वीकार करे.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 5, 2012 at 6:59pm

अलबेला खत्रीजी, राजेश कुमारीजी, और रेखा जोशीजी,और प्रदीप सिंह कुशवाहजी रचना आप जैसे रसिक साहित्यकारों द्वारा पसंद करना रचना की सार्थकता बयां करती है | आप जैसे मनीषियों का मार्गदर्शन करने की मुझ में सामर्थ नहीं है, मैंने तो सदगुरू के मुखारविंद से सुनी कथा के सर तत्व को काव्य रूप देने का प्रयास भर किया है | मेरे उत्साह वर्धन किया, हार्दिक धन्यवाद |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2012 at 5:46pm

लक्ष्मण प्रसाद लडिवाला जी बहुत सुन्दर रचना एक सबक देती हुई 

Comment by Rekha Joshi on June 5, 2012 at 5:33pm

लक्ष्मण जी ,सादर नमस्ते ,

तीक्ष्ण बुद्धि नहीं कारगर, परम पिता को पाने में,
पवित्र बुद्धि ही चाहिए, प्रभु से लगन लगाने में |,बहुत बढ़िया ,बधाई 
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 5, 2012 at 5:29pm

धन्यवाद महोदय जी, बहुमूल्य मार्ग दर्शन हेतु.

Comment by Albela Khatri on June 5, 2012 at 9:32am

आपने  बहुत ख़ूब  उदाहरण दिया है  लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला जी...........जिन लोगों को  पढ़ कर हम विद्वान कहते हैं  वे लोग  कभी किसी  डिग्री के लिए कालेज  नहीं गये.  कबीर पर लोग पीएच. डी. करते हैं  लेकिन कबीर  "मसि कागद छुओ नहिं"

आपकी रचना  अनुपम है.........बधाई !

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