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जो आदमी ज़मीं से जुड़ा रह नहीं सका

जो आदमी ज़मीं से जुड़ा रह नहीं सका।

वो ज़ोर आंधियों का कभी सह नहीं सका॥

 

हिकमत1 से चोटियों पे पहुँच तो गया मगर,

कुछ देर तक वहाँ पे खड़ा रह नहीं सका ॥

 

जिसने बग़ावतें2 की नहीं ज़ुल्म के खिलाफ़,

इज़्ज़त से शानो शौक़ से वो रह नहीं सका॥

 

ठहरा हूँ झील सा मैं तेरे इंतिज़ार में,

दरिया3 की तरह खुल के कभी बह नहीं सका॥

 

सैलाब4 आंसुओं का मेरी आँख में तो था,

ये बात और है वो कभी बह नहीं सका॥

 

वो चाहता था मुझको दिलो जान से मगर,

जज़्बात5 अपने दिल के कभी कह नहीं सका॥

 

यादों का महल दिल में सलामत6  है आज भी,

जाने के तेरे बाद भी ये ढह नहीं सका॥

 

ज़ुल्मों के बर-खिलाफ़7 में “सूरज” खड़ा रहा,

बे-दाद8 ज़िंदगी में कभी सह नहीं सका॥

                                     डॉ. सूर्या बाली “सूरज”

1. चाल, जुगाड़, 2. विद्रोह 3. नदी 4. जल-प्लावन, बाढ़ 5. भावनाएँ

6. कायम, बरक़रार 7. उल्टा, विपरीत  8. अन्याय, अत्याचार

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 17, 2012 at 3:25pm

जिसने बग़ावतें2 की नहीं ज़ुल्म के खिलाफ़,

इज़्ज़त से शानो शौक़ से वो रह नहीं सका॥

 बहुत खूब 

बधाई 

Comment by वीनस केसरी on July 6, 2012 at 11:40pm

बहुत खूब डॉक्टर साहब
हर शेर पर आपके खास अंदाजे बयां की मुहर लगी हुई है

दो शेर लय से भटक रहे हैं, देखिएगा ...

Comment by AVINASH S BAGDE on July 6, 2012 at 8:50pm

यादों का महल दिल में सलामत6  है आज भी,

जाने के तेरे बाद भी ये ढह नहीं सका॥...ek shandar mukammal gazal Bali sir.

 

Comment by Rekha Joshi on July 6, 2012 at 5:31pm

सूरज जी ,सादर नमस्ते ,

ठहरा हूँ झील सा मैं तेरे इंतिज़ार में,

दरिया की तरह खुल के कभी बह नहीं सका॥,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई 

Comment by deepti sharma on July 6, 2012 at 4:05pm

आदरणीय श्री डॉ. बाली जी,

  बहुत प्रभावशाली है आपकी ग़ज़ल

शुभकामनायें|

Comment by Yogi Saraswat on July 6, 2012 at 3:45pm
आदरणीय श्री डॉ. बाली जी सादर नमस्कार ! कल में उर्दू में लिखी फैज़ अहमद फैज़ की गज़लें पढ़ रहा था , और भी गज़लें पढ़ीं हैं ! सही कहूं तो उन्हें जो सम्मान हासिल है , शायद उस ज़माने में आप जैसे लोग नहीं रहे होंगे ग़ज़ल कहने वाले अन्यथा मुझे पूरा भरोसा है आप भी उस जगह होते ! दो बातें है आपकी ग़ज़लों में ( मैं ज्यादा नहीं जानता ) एक तो कहने का ढंग आपका बड़ा मदहोश करने वाला है , दूसरे आपकी ग़ज़लों में एक तरह की रवानी होती है , मिठास होती है ! काश ! की भगवान् मुझे भी आपकी तरह ग़ज़ल लिखना सिखा देता ! ये ग़ज़ल भी आपके हुनर को एकदम सही तरह से प्रस्तुत करती है ! बहुत मीठी ग़ज़ल है आपकी !
Comment by sangeeta swarup on July 6, 2012 at 11:05am

जीवन में संघर्ष के लिए ज़रूरी है  ज़मीन से जुड़ना ..... बहुत सुंदर गज़ल

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