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हंसों का जोड़ा (एक प्रेम गीत)

हंसों का जोड़ा  (एक प्रेम गीत)
 
दो आतुर हंसों का जोड़ा
नेह मिलन जब बेसुध दौड़ा,
 
कुछ कुछ जागा, कुछ कुछ सोया
इक दूजे में बिलकुल खोया,
 
अर्धखुली सी उनकी आँखें
मंद मंद सी महकी साँसें,
 
धड़कन में लेकर मदहोशी
कुछ हलचल औ कुछ खामोशी ,
 
कदमों  में दीवानी थिरकन
बहके बहके से अंतर्मन ,
 
पल भर की खुशियों का संगम
जी लेना है सारा जीवन,
 
प्यार लिए सीने के अन्दर
पार किये हैं सात समुन्दर,
 
नज़रों नें नज़रों को देखा
है जैसे किस्मत का लेखा,
 
नयनों में बातों का होना 
इक दूजे में उनका खोना,
 
वक़्त की जैसे चाल थमी है
गठ-बंधन की डोर जुड़ी है,
 
उनको कुछ ना सूझ रहा है
मन सपनों के बीच खड़ा है,
 
अरमाँ लेते हैं अंगड़ाई
गूँज उठी जैसे शहनाई,
 
नेह मिलन मीतों का संगम
प्यार में भीगे हैं दोनों मन,
 
मदहोशी का है वो आलम
जैसे मिले हों दूल्हा दुल्हन,
 
दो रूहें खामोश हुई हैं
जनम जनम के बाद मिली हैं,
 
जैसे अरमानों की बदरी
मरुधर में जी भर बरसी है.....
 
 

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on July 13, 2012 at 2:57pm

बहुत खुबसूरत गीत, पढ़ कर बड़ी प्रसन्ता हुई, हार्दिक बधाई व साधुवाद

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 13, 2012 at 11:01am

//

वक़्त की जैसे चाल थमी है
गठ-बंधन की डोर जुड़ी है,
 
उनको कुछ ना सूझ रहा है
मन सपनों के बीच खड़ा है,
 
अरमाँ लेते हैं अंगड़ाई
गूँज उठी जैसे शहनाई,
 
नेह मिलन मीतों का संगम
प्यार में भीगे हैं दोनों मन,//
वाह डॉ ० प्राची जी! वाह !.... उत्कृष्ट भावों से युक्त शृंगार रस से परिपूर्ण बेमिसाल रचना रची है आपने .....हार्दिक बधाई व साधुवाद ....
Comment by deepti sharma on July 12, 2012 at 10:50pm

प्यार से भरा ये प्यारा गीत मन को भा गया बहुत ही सुंदर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2012 at 10:18pm

श्रृंगार रस में डूबी भावनात्मक अनुभूति प्यार साकार हो उठा वाह वाह प्राची जी बहुत सुन्दर रचना 

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 12, 2012 at 10:06pm

नयनों में बातों का होना 

दोनों का दीवाना होना,
 
वक़्त की जैसे चाल थमी है
गठ-बंधन की डोर जुड़ी है,
 
उनको कुछ ना सूझ रहा है
मन सपनों के बीच खड़ा है,
आदरणीया डॉ प्राची जी ..बहुत सुन्दर प्रणय गीत ..मन सपनों के बीच खड़ा है.. खोया है ...खूबसूरत उदगार छलकता हुआ प्यार ...आया सावन झूम के ..
भ्रमर ५ 
Comment by Albela Khatri on July 12, 2012 at 9:55pm

आदरणीय डॉ प्राची सिंह जी.........
जय हो आपकी
आपने तो आज संयोग शृंगार को साकार कर दिया
हाय हाय हाय .....क्या शब्द चुने हैं..........क्या गति दी है
वाह !

अरमाँ लेते हैं अंगड़ाई
गूँज उठी जैसे शहनाई,
 
नेह मिलन मीतों का संगम
प्यार में भीगे हैं दोनों मन,
 
मदहोशी का है वो आलम
जैसे मिले हों दूल्हा दुल्हन,
 
दो रूहें खामोश हुई हैं
जनम जनम के बाद मिली हैं,
 
जैसे अरमानों की बारिश
से मरुधर की प्यास बुझी है......

___इन पंक्तियों पर कौन क़ुरबान न होगा

_____पर एक बात कहनी थी.... सावन के मदमाये और रोमेंटिक मौसम में आपको ये क्या सूझी कि जोड़ा दो हंसों का बना दिया ...अरे भाई  हंसनी  के बिना हंस क्या माथा फोड़ेंगे एक दूसरे का ?

हा हा हा हा हा .........बुरा न मानना ...........पर बधाई अवश्य स्वीकारना ...दिल से दे रहा हूँ.........

___अभिनन्दन आपकी इस अनुपम कविता का ............
Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2012 at 8:43pm

बेहद भाव पूर्ण प्रस्तुति है आपकी
बस पढता गया और भीगता गया श्रृंगार रस की बारिश हो गयी
वाह वाह

अर्धखुली सी उनकी आँखें

मंद मंद सी महकी साँसें

अर्थात सम्पूर्ण प्रेम मग्न जोड़े जो नशे मैं है जान पड़ते हैं
वाह वाह

धड़कन में लेकर मदहोशी

कुछ हलचल औ कुछ खामोशी

बेकल ह्रदय है
जिसमे लहरें उठ उठ के शोर कर रही हैं
पर लैब खामोश भी है
वाह वाह

नेह मिलन मीतों का संगम

प्यार में भीगे हैं दोनों मन

बेहद भावात्मक ह्रदय स्पंदित कर देने वाले शब्द बेजोड़ रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई

कृपया ध्यान दे...

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