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परिवर्तन के नाम पर ,अलग -अलग है सोच 

किसी ने वरदान कहा ,इसे किसी ने बोझ ||

परिवर्तन वरदान है ,या कोई अभिशाप 

एक को बांटे खुशियाँ ,दूजे को संताप ||

विघटित करके देश के ,कई प्रांत बनवाय 

महा नगर विघटित हुए ,इक -इक शहर बसाय||

शहर- शहर विघटित हुए ,और बन गए ग्राम 

ग्रामों में गलियाँ बनी ,परिवर्तन से  धाम||

घर बाँट दीवार कहे ,परिवर्तन की खोज

बूढ़े मात -पिता कहें ,ये छाती पर सोज ||

जो नियम भगवान् रचे ,वो वरदान कहाय

मौसमी परिवर्तन पर ,प्रकृति शीश नवाय||

कहीं -कहीं इंसान ने ,खूब  किये हैं काम 

परिवार नियोजित किये ,परिवर्तन के नाम ||

दोष पतन की खान हैं ,जाने सकल जहान

स्वभाव परिवर्तित करे ,वो इंसान महान ||

जो प्रकृति से छल करे ,स्वारथ हित में रोज 

वो परिवर्तन तो बने ,उस जीवन पर सोज  ||

परिवर्तन वरदान बन ,प्रगति प्रशस्त कराय

बसा रहा स्वारथ अगर ,काल गर्त बन जाय ||

********

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 13, 2012 at 9:28am

बहुत सुन्दर रचना है आदरणीया राजेश कुमारी जी
बाकी का मेरे अग्रजों ने कह ही दिया है
गेयता की दृष्टि से थोडा कमजोर है भाव पक्ष प्रबल है
आपकी इस रचना को नमन
बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2012 at 9:27am

सतीश मापतपुरी जी प्रशंसा के लिय हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 13, 2012 at 9:26am

हार्दिक आभार आशीष जी 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 13, 2012 at 2:00am

आदरेया राजेश कुमारी जी,

सुंदर सारे भाव हैं, पूरी मन की आस

मनभावन दोहे  रचे, बेहतर हुआ प्रयास..

बहुत-बहुत बधाई .....

बहुत जरूरी गेयता, दूर करें यह दोष..

सीमाजी ने सच कहा, मन में  नहिं संतोष.

आपके अधिकतर दोहों में यद्यपि मात्राएँ १३-११ ही हैं तथापि कुछ दोहे गेयता में नहीं आ पा रहे ......

मात्राओं की दृष्टि से 'स्वार्थ हित में रोज' (१०) के बजाय 'स्वारथ हित में रोज'(११) ठीक रहेगा  .....

रोज-बोझ जैसे तुकांत शब्दों पर एक नजर वांछित है ....

किसी अच्छे  दोहाकार को  पढ़कर खूब अभ्यास करिये .....निखार स्वतः ही आने लगेगा .......

Comment by satish mapatpuri on July 13, 2012 at 1:07am

बहुत  खुबसूरत दोहे ... बधाई राजेश कुमारी जी

Comment by आशीष यादव on July 13, 2012 at 12:10am

परिवर्तन कितना हुआ, कितना बदला रंग।
दोहों से बतला दिया, रहा अनूठा ढ़ंग।।
सारे दोहे वाह जी, भाव भरे अनमोल।
मुझ पर भी तो ध्यान दो, शिल्प रहा यह बोल।।
बहुत अच्छे दोहे दोहे। परिवर्तन को खूब लिखा है। बस कहीं कहीं शिल्प में त्रुटि दिखती है।
बहुत-बहुत बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2012 at 11:42pm

लक्ष्मण प्रसाद लडिवाला जी आपकी प्रतिक्रिया सर आँखों पर हार्दिक आभार 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 12, 2012 at 11:38pm
आपकी परिवर्तन पर सोच ने को मजबूर करती कविता 
सोचने का अपना अपना नजरिया, दिमाग में बहती सरिता 
बूढ़े माँ -बांप के सोच और युवा उत्साही का अलग ही तरीका 
एक कहे परम्परावादी सोच तो दूजा प्रयोगवादी है सलीका |
कैसा भी हो परिवर्तन, सदा आगे बढ़ने का हो सन्देशा
तभी कहलायेगा धनात्मक परिवर्तन पथ पर हमेशा 
 -लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2012 at 11:34pm

बहुत बहुत आभार सीमा जी दोहों का इतना गहन विश्लेषण किया है बांटे किसी को खुशियाँ में मैंने तो १३ मात्रा ही गिनी हैं आप १४ कैसे बता रही हैं कृपया स्पष्ट करें 

परिवर्तन के नाम पर ,अलग -अलग है सोच (१३-११) 

किसी ने वरदान कहा ,इसे किसी ने बोझ इसमें गेयता कहाँ प्रभावित हो रही है प्लीज बताएं इसमें सम चरण में लघु गुरु भी लिया है फिर कहाँ गलत है     

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 12, 2012 at 10:58pm

प्रिय दीप्ति तुम्हारे प्यार भरे शब्द मिले और क्या चाहिए हार्दिक आभार 

कृपया ध्यान दे...

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