For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")


"गाँव जायेंगे "

हरियाली ही हरियाली
चहुँ ओर
प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य
हरी कारपेट आलौकिक माधुर्य
अहा
सोच रहा हूँ
क्यूँ न इन घटाओं को छू लूं
चूम लूं इस माटी को
.
.
.
.
.
आँखों की पुतली
कभी छोटी कभी बड़ी
वो दूर
सूरज ढल रहा है
या आग का गोला धरती में समा रहा है
अदभुद दृश्य
केमरा भी शर्मा जाए
प्रकृति की सुन्दरता देख
.
.

आहा क्या मधुर तान है
चिड़िया का चहकना
कोयल की तान
वाह मन प्रसन्न हो उठा
जाने का मन नहीं हो रहा
.
.
.

छप छप
छी ये क्या
मुंह में सिकुडन
कीचड
मूड ख़राब कर दिया सारा
जूते खराब हो गए
पिछले महीने तो खरीदे थे
बाटा के शो रूम से
क्या यार
.
.
.

ये गाँव के लोग भी न
न जाने कैसे रह लेते हैं
गंवार कहीं के
गोबर के कीड़े को
गोबर में ही मजा आता है
सडियल सा गाँव
घटिया सा
.
.
.
चलो मुझे पैर धोने हैं
कहाँ से आ गए
तुम भी न
कहीं भी ले आते हो
१०० किलोमीटर दूर
ये गाँव ही मिला था
बेबकूफ
हरियाली दिखायेंगे
गाँव जायेंगे

संदीप पटेल "दीप"

Views: 448

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 27, 2012 at 10:42am

कीचड़ पड़ते ही सारी मस्ती उड़न छू  यही तो असलियत है कहते हैं न माटी में माटी बनकर काम करते हैं कृषक और हम सफ़ेद पोश हैं कि जरा सा कीचड़ भी सहन नहीं कर सकते बहर हाल रचना में हास्य व्यंग का अच्छा प्रयोग किया है बहुत पसंद आया 

Comment by Er. Ambarish Srivastava on July 27, 2012 at 10:00am

वाह संदीप जी वाह ....

क्या वास्तविकता बयां की है आपने..................गांव की मस्ती में थे जनाब पर ..... कीचड़ में पांव पड़ते ही गांव देखने की ललक उड़न छू हो गयी और असलियत पर उतर आये ....वाह वाह वाह ...इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें मित्र ....सस्नेह  

Comment by आशीष यादव on July 26, 2012 at 10:52pm

वाह सर, क्या खूब भावनाओं को उकेरा है। किसी को कहीं खुशी मिलती है तो किसी को कहीं। बाटा वाले को क्या मालूम की जो मजा नंगे पावँ चलने मे है वो क्या होता है। प्रभु की मूरत जैसी, जैसी देखो वैसी ही है।
सुन्दर रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये

Comment by Rekha Joshi on July 26, 2012 at 10:41pm

सदीप जी 

आहा क्या मधुर तान है
चिड़िया का चहकना
कोयल की तान
वाह मन प्रसन्न हो उठा
जाने का मन नहीं हो रहा,बहुत किस्मतवाले है आप जो इस प्रकृति से मधुर संगीत को सुना ,तबियत खुश हो गई ,आभार 
Comment by Albela Khatri on July 26, 2012 at 9:38pm

वाह भाई संदीप जी........
इस विषय पर इस से बेहतर कुछ नहीं कहा होगा किसी ने...

कीचड
मूड ख़राब कर दिया सारा
जूते खराब हो गए
पिछले महीने तो खरीदे थे
बाटा के शो रूम से
क्या यार
___उम्दा चित्र  !
.

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Tuesday
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Tuesday
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Tuesday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Jul 9
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service