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कवितायेँ कैसे बनती है...............!!

कविताये कैसे बनती है 

कुछ खबर नहीं होती 
बस ..........................
दिल की कुछ भावनाएं होती है 
जो शब्दों का रूप लेकर 
कागज पर उतर आती है
और कवितायेँ बन जाती है
कवितायेँ कैसे बनती है........................
कवितायेँ .................
कभी दर्द से जन्म लेती है
कभी गम का रूप होती है
कभी दिल की ख़ुशी की पहचान बनती है
तो कभी विरोध के लिए लिखी जाती है
कवितायेँ कैसे.....................
कवितायेँ .................
जो सच्चाई से भरी होती है
कभी समाज के लिए , देश के लिए 
तो कभी किसी खास के लिए लिखी जाती है
कवितायेँ जिनमे नफरत नहीं होती
कवितायेँ तो बस प्यार से लिखी जाती है
कवितायेँ कैसे.....................
कवितायेँ.................
जो समाज का आईना होती है 
कवितायेँ ................
जो "बस यूँ ही" बन जाती है 
कवितायेँ .............
जो उडती है मन के आकाश में 
कवितायेँ ........
जिनकी कोई सीमा नहीं होती
कवितायेँ ...................
जो एक कवि/ कवियत्री की भावनाओ को व्यक्त करती है
कवितायेँ कैसे........................
कवितायेँ .....................
जो खुद में बहुत कुछ समेटे होती है
कभी-कभी बेनाम ही रह जाती है
कवितायेँ.................
तलाश करती है अपने अस्तित्व को 
प्रकाशन विभागों की दुनिया में 
लेकिन अधिकतर खाली हाथ ही लौट आती है
कविताये कैसे............
कवितायेँ ..............
होती तो है एक कवि/कवयित्री के विचारो के अक्स 
मगर पूछो उनसे कि कवितायेँ कैसे बनती है
तो एक ही जवाब आता है.................
कवितायेँ न जाने कैसे बनती है........
कवितायेँ तो "बस यूँ ही" बनती है ...
जैसे भी बनती खुद-ब-खुद बनती है
कवितायेँ कैसे बनती है...............!!

Views: 1511

Comment

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Comment by AVINASH S BAGDE on August 8, 2012 at 10:15am

दिल की कुछ भावनाएं होती है 
जो शब्दों का रूप लेकर 
कागज पर उतर आती है
और कवितायेँ बन जाती है...bahut khoob Sonam ji..aapake dil ki bhawanaye khoobasoorati se kagaz hi nahi dil me bhi utar gai....

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 7, 2012 at 12:03pm

//कवितायेँ न जाने कैसे बनती है........
कवितायेँ तो "बस यूँ ही" बनती है ...
जैसे भी बनती खुद-ब-खुद बनती है
कवितायेँ कैसे बनती है...............!!//

वाह सोनम सैनी जी वाह ........आपने तो अपनी इस कविता के माध्यम से कविता को ही परिभाषित कर दिया है .....बहुत बहुत बधाई स्वीकारें ....सस्नेह !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 7, 2012 at 11:35am

जैसे भी बनती खुद-ब-खुद बनती है

बात सही लगती है

जाना अब कविता कैसे बनती है.

बधाई, स्नेही सोनम जी शुभाशीष के साथ.

 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 6, 2012 at 9:23pm

कवितायेँ.................
तलाश करती है अपने अस्तित्व को 
प्रकाशन विभागों की दुनिया में 
लेकिन अधिकतर खाली हाथ ही लौट आती है

कवियों कि दुखती रग पर हाथ रखती  सुन्दर पंक्तियों के लिए बधाई सोनम जी.

Comment by Rekha Joshi on August 6, 2012 at 7:22pm

कवितायेँ .................
जो सच्चाई से भरी होती है
कभी समाज के लिए , देश के लिए 
तो कभी किसी खास के लिए लिखी जाती है
कवितायेँ जिनमे नफरत नहीं होती
कवितायेँ तो बस प्यार से लिखी जाती है,बहुत खूब  ,बढ़िया रचना पर हार्दिक बधाई सोनम जी 

Comment by Yogi Saraswat on August 6, 2012 at 4:26pm

जो खुद में बहुत कुछ समेटे होती है
कभी-कभी बेनाम ही रह जाती है
कवितायेँ.................
तलाश करती है अपने अस्तित्व को 
प्रकाशन विभागों की दुनिया में 
लेकिन अधिकतर खाली हाथ ही लौट आती है
कविताये कैसे............

ati sundar sonam ji ! bahut badhiya

sach hi hai dil ke dard , man ki khushi jab shabdon mein bayan hoti hai to kavita banti hai !

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