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भाव निर्झरणी बहे /गीत

भाव निर्झरणी बहे बस है विनत यह कामना 
जब लिखे दिल से लिखे कवि,सत्य हो या कल्पना

परख सत्यासत्य की रख ,सृजन पथ गढ़ते रहें 
त्याग व्यष्टि समष्टि हित ,शब्द नद भरते रहें 
कर नवल,चिंतन,मनन शुभ ,गूंथ माला काव्य की
शारदे माँ की हृदय से कवि करो तुम अर्चना 

भाव निर्झरणी बहे बस है विनत यह कामना 
जब लिखे दिल से लिखे कवि,सत्य हो या कल्पना 

मनुजता हित नाद अनहद ,अटल दृढ विश्वास के 
स्नेह सिंचित सुर सजादो,दिव्यतम आभास के 
गरल विगलित बैर के हों ,प्रीत के मकरंद से 
मधुरतम शाश्वत तरंगित, कवि रचो सुख-व्यंजना 

भाव निर्झरणी बहे बस है विनत यह कामना 
जब लिखे दिल से लिखे कवि,सत्य हो या कल्पना

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Comment by seema agrawal on August 24, 2012 at 11:27am

आदरणीय सौरभ जी आपकी प्रतिक्रिया और शुभकामनाओं के लिए हृदय से धन्यवाद 

Comment by seema agrawal on August 24, 2012 at 11:26am

धन्यवाद सूबे सिंह सुजान जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 23, 2012 at 10:31pm

आदरणीया सीमाजी, आपकी इस कविता के लिये आपको हृदय से बधाई दे रहा हूँ. आपका स्वाध्याय मुखर हो कर प्रसूत हआ है.

इन पंक्तियों पर सादर बधाई स्वीकारें -

गरल विगलित बैर के हों ,प्रीत के मकरंद से
मधुरतम शाश्वत तरंगित, कवि रचो सुख-व्यंजना

सादर शुभकामनाएँ.

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 23, 2012 at 10:17pm

सीमा जी आपने कवि के लिये एक सुन्दर हिदायत दी है । बहुत अच्छी बात है।

भाव निर्झरणी बहे बस है विनत यह कामना 
जब लिखे दिल से लिखे कवि,सत्य हो या कल्पना

Comment by seema agrawal on August 8, 2012 at 4:39pm

धन्यवाद अरुण शर्मा "अनंत"जी एवं अविनाश जी 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 8, 2012 at 12:12pm

आदरणीया बहुत सुन्दर गीत लिखा है आपने, बहुत-२ बधाई

Comment by AVINASH S BAGDE on August 8, 2012 at 10:24am

कर नवल,चिंतन,मनन शुभ ,गूंथ माला काव्य की...umda.

स्नेह सिंचित सुर सजादो,दिव्यतम आभास के ..bahut khoob

मधुरतम शाश्वत तरंगित, कवि रचो सुख-व्यंजना 

जब लिखे दिल से लिखे कवि,सत्य हो या कल्पना...dil se likhi bat...wah...Seema ji

Comment by seema agrawal on August 7, 2012 at 11:11pm

संदीप जी लक्ष्मण जी  रेखा जी और अशोक जी  आप सभी को गीत पसंद करने के लिए धन्यवाद 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 7, 2012 at 10:21pm

मनुजता हित नाद अनहद ,अटल दृढ विश्वास के 
स्नेह सिंचित सुर सजादो,दिव्यतम आभास के 
गरल विगलित बैर के हों ,प्रीत के मकरंद से 
मधुरतम शाश्वत तरंगित, कवि रचो सुख-व्यंजना 
बहुत ही सुन्दर भावों से सजे इस गीत के लिए सीमाजी बधाई स्वीकारें.

Comment by Rekha Joshi on August 7, 2012 at 10:00pm

भाव निर्झरणी बहे बस है विनत यह कामना 
जब लिखे दिल से लिखे कवि,सत्य हो या कल्पना ,अति सुंदर गीत सीमा जी ,मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें 

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