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"कील चुभी वो नहीं विलग "

"कील चुभी वो नहीं विलग "

वे कहते हैं सब भूल गये

हम कहते कुछ भी याद नहीं

कारण मैंने भी किया वही

जो उसने पिछले साल किये

अब उसके भी एक आगे है

मेरे भी पीछे बाँध दिए !!

रस्में पूर्ण समाज ख़ुशी

हम भी फिरते हैं ख़ुशी ख़ुशी

हुए मुखरित अंकुर दूर सहज

पर कील चुभी वो नहीं विलग !!

अब कील चुभी दो हाथ मिले

संतुष्ट सभी कुछ आस हिये

लुट जाओ उनका हार बने

रोको मोती ना डूब मरे !!

वे भूले क्या ? जब ध्यान करें

क्या याद नहीं ? हम याद करें

आधार एक छवि एक मिली

दो प्राणों की है एक जमीं !!

मरोड़ दो छोड़ दो वहीँ नव-पल्लव को

ये आहें सांसें लेने को शीश उभर आया है ,

पी जाओ विष हैं ठीक कहे ,

है समता ,हम भी भूल गए !!

 

 (पहला प्यार भूलता कहाँ है )

 

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

कुल्लू यच पी 
१.०० पूर्वाह्न ७.८.२०१२ 

 

 

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Comment by Ashok Kumar Raktale on August 7, 2012 at 10:40pm

रस्में पूर्ण समाज ख़ुशी

हम भी फिरते हैं ख़ुशी ख़ुशी

हुए मुखरित अंकुर दूर सहज

पर कील चुभी वो नहीं विलग !!

बहुत बढ़िया भ्रमर जी बधाई.

Comment by UMASHANKER MISHRA on August 7, 2012 at 10:13pm

कील चुभी वो नहीं विलग "

एकदम सही फरमाया है सर जी

हर पल है छन की योदों को तरो ताज़ा करती ये कविता

दो प्राणों की है एक जमीं !! बहुत ही खूब कहा

बहुत बहुत बधाई सुरेन्द्र जी

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 7, 2012 at 7:55pm

कील चुभी वो नहीं विलग -सुन्दर रचना जो व्यक्त करती मेरे इन भावों को-

आधा एक छवि एक पहचान,दो प्राण मिलकर हुए एक जान
विवाहित एक दूजे को प्यार करने वालों की यही पहचान -
क्या सखी हीर राँझा -नहीं सखी प्रेमी दंपत्ति
हार्दिक बधाई भाई सुरेन्द्र भरमार जी  
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 7, 2012 at 2:36pm

आदरणीय अम्बरीश जी सच में पहला प्यार अपना घर तो मन में बना ही लेता है जब बिछड़े भी कभी मिल जाए तो एक सुन्दर छुवन वो चितवन कुछ कह ही जाती है बरबस .....आभार प्रोत्साहन हेतु 

भ्रमर ५ 
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 7, 2012 at 2:34pm

आदरणीय कुशवाहा पहले प्यार ने आप के दिल को भी छुआ कुछ सत्य लगा रचना में लिखना सार्थक रहा आभार 

भ्रमर ५ 
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 7, 2012 at 2:33pm

प्रिय अजीतेंदु जी जय श्री राधे ..रचना पहले प्यार की दास्ताँ आप को पसन्द आई सुन हर्ष हुआ आभार
भ्रमर ५

Comment by Er. Ambarish Srivastava on August 7, 2012 at 12:09pm

दो प्राणों की है एक जमीं....

'पहला प्यार भूलता कहाँ है' .........सुंदर पंक्तियाँ .....बधाई ....

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on August 7, 2012 at 11:16am

पहला प्यार भूलता कहाँ है

सत्य ही कहा है. आदरणीय भ्रमर जी, सादर अभिवादन के साथ.

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 7, 2012 at 10:59am

दो प्राणों की है एक जमीं !!

मरोड़ दो छोड़ दो वहीँ नव-पल्लव को

sundar panktiyan.......badhai......

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