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कंक्रीट के वृक्ष

यहाँ वृक्ष हुआ करते थे
जो कभी
लहलहाते थे
चरमराते थे
उनके पत्तों का
आपस का घर्षण
मन को छू लेता था
उनकी डालों की कर्कश
कभी आंधी में
डराती थी मन को  |
बारिश के मौसम की
खुशबू और ताज़गी
कुछ और बढ़ा देती थी
जीवन को  ||

उन वृक्षों की पांत
अब नहीं मिलती
देखने तक को भी
लेकिन , हाँ !
वृक्ष अब भी हैं
वही डिजाईन
वही उंचाई
शायद उंचाई तो कुछ
और भी ज्यादा हो
मगर इनसे हवा
नहीं मिलती
नहीं मिलती
इनसे खुशबू
न कोई आनंद
लेकिन
निश्चित ही
ये वृक्ष
पैसे उगलते हैं
जिसके लिए
हर कोई
पागल बना फिरता है
मगर इतने पर भी
इन वृक्षों से मोह
नहीं हो पाता
कैसे हो ! आखिर
हमने इन्हें सीमेंट से
जो सींचा है  |
भावनाएं कैसे समझेंगे
ये कंक्रीट के वृक्ष
हमारी भावनाओं का
घड़ा भी तो
इनके लिए रीता है  ||

Views: 817

Comment

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Comment by Yogi Saraswat on August 22, 2012 at 3:56pm

आदरणीय श्री अलबेला जी , आपको मेरे शब्द पसंद  आये , अच्छा लगा ! जी , मुझे पता चल गया है , कुछ टायपिंग की गलती हुई है ! बहुत बहुत आभार , आपने इस ओर ध्यान दिलाया !  आशीर्वाद बनाये रखियेगा

Comment by Yogi Saraswat on August 22, 2012 at 3:53pm

 आदरणीय श्री बागी  जी , आपको मेरे शब्द पदंड आये , अच्छा लगा ! बहुत बहुत आभार ! आशीर्वाद बनाये रखियेगा

Comment by Yogi Saraswat on August 22, 2012 at 3:51pm

बहुत बहुत आभार , आदरणीय श्री सौरभ पाण्डेय  जी , एक छोटी सी कोशिश करी है ! आपको मेरी कोशिश पसंद आई !बहुत बहुत आभार !

Comment by Yogi Saraswat on August 22, 2012 at 3:49pm

बहुत बहुत आभार , आदरणीय रेखा जोशी जी , आपका आशीर्वाद मिला !

Comment by Rekha Joshi on August 22, 2012 at 1:27pm

ये कंक्रीट के वृक्ष 
हमारी भावनाओं का 
घड़ा भी तो 
इनके लिए रीता है  ||अति सुंदर भाव आदरनीय योगी जी बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 21, 2012 at 10:51pm

बेहतर प्रयास किया है आपने, योगी भाईजी.

इन पंक्तियों का क्या अर्थ हुआ -

उनके पत्तों का
आपस का घर्षण
मन को छू लेता था
उनकी डालों की कर्कश
कभी आंधी में
डराती थी मन को  |

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 21, 2012 at 9:50pm

Natural की तुलना Artificial से होना मुश्किल है, बहुत ही प्यारी रचना, एक व्यापक सन्देश छोड़ती रचना पर बधाई स्वीकार कीजिये आदरणीय |

Comment by Albela Khatri on August 21, 2012 at 8:46pm

बधाई योगी जी बधाई
बहुत बहुत बधाई
सुन्दर कविता

न वृक्षों की पांत
अब नहीं मिलती
देखने तक को भी
लेकिन , हाँ !
वृक्ष अब भी हैं
वही डिजाईन
वही उंचाई
शायद उंचाई तो कुछ
और भी ज्यादा हो
मगर इनसे हवा
नहीं मिलती
नहीं मिलती
इनसे खुशबू
न कोई आनंद
___आ हा हा हा हा ..क्या बात है
करार कटाक्ष किया  आपने  कंक्रीट के जंगल पर.........बधाई
कहीं कहीं  टंकण का दोष रह गया है ज़रा  नज़र मार लें और ठीक करलें.........धन्यवाद

Comment by राजेश 'मृदु' on August 21, 2012 at 6:17pm

शहरीकरण पर एक सुंदर रचना, अंत मर्म को भेद जाता है

Comment by Sonam Saini on August 21, 2012 at 4:02pm

bahoot achhi kavita h yogi sir , yhi to rang h badalti hui dunia ka

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