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इस तरह दूर वो आजकल हो गई।

जैसे इस शहर की बिजली गुल हो गई।

देह तेरी  किसी  बेल  जैसी लगे,

आई बरसात धुलकर नवल हो गई।

इस तरह रास्ते और लम्बे हुये,

जैसे के मेरी लम्बी ग़ज़ल हो गई।

बेवफा क्या बताऊँ तेरी बाट में,

प्यार की बर्फ पिघली,और जल हो गई।

आम की भोर पर भंवरे जो आ गये

मुस्कुराहट मधुरता  का  फल हो गई।

एक बरसात आई तुम्हारी तरह,

और जोहड में खिल कर कमल हो गई।।

                                      सूबे सिंह सुजान

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Comment by सूबे सिंह सुजान on August 23, 2012 at 9:51pm

SANDEEP KUMAR PATEL........पटेल साहब शुक्रिया....

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 23, 2012 at 9:49pm
Comment by वीनस केसरी on August 23, 2012 at 1:28am

बहुत खूब, सूबे साहब अच्छी ग़ज़ल कही है ...

एक बरसात आई तुम्हारी तरह,

और जोहड में खिल कर कमल हो गई।।

वाह वा क्या कहने ...

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 23, 2012 at 12:43am

satish mapatpuri...जी आपकी राय जान कर मन को तसल्ली हुई की कुछ लिख तो पाया हूँ।

धन्यवाद।

Comment by सूबे सिंह सुजान on August 23, 2012 at 12:41am

Naval Kishor Soni.....जी बहुत शुक्रिया आपकी प्रतिक्रिया अमूल्य है।

Comment by Naval Kishor Soni on August 22, 2012 at 3:44pm

इस तरह दूर वो आजकल हो गई।

जैसे इस शहर की बिजली गुल हो गई।

देह तेरी  किसी  बेल  जैसी लगे,

आई बरसात धुलकर नवल हो गई--------------wah kya bat hai .

Comment by राजेश 'मृदु' on August 22, 2012 at 1:28pm

बड़ी मीठी गज़ल है, बधाई

Comment by Rekha Joshi on August 22, 2012 at 12:59pm

आम की भोर पर भंवरे जो आ गये

मुस्कुराहट मधुरता  का  फल हो गई।

एक बरसात आई तुम्हारी तरह,

और जोहड में खिल कर कमल हो गई।।अति सुंदर अभिव्यक्ति सूबे सिंह जी ,बधाई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on August 22, 2012 at 12:24pm

बेवफा क्या बताऊँ तेरी बाट में,

प्यार की बर्फ पिघली,और जल हो गई।

बहुत खूब साहब

Comment by satish mapatpuri on August 22, 2012 at 2:53am

देह तेरी  किसी  बेल  जैसी लगे,

आई बरसात धुलकर नवल हो गई।

बहुत खूब सुजान साहेब ... बधाई हो

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