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ग़ज़ल - बादलों और बिजलियों की नेमतें

ग़ज़ल - बादलों और बिजलियों  की नेमतें
 
बोलते चेहरों को सुनता ही रहा ,
वो अदद एक ख्वाब बुनता ही रहा |
 
बादलों और बिजलियों  की नेमतें  ,
बारिशों की बूँद चुनता ही रहा |
 
गीत के मुखड़े पे चर्चा खूब की ,
अंतरे चुपचाप गुनता ही रहा |
 
हर ग़ज़ल मेरी उदासी का किला ,
शेर दीवारों में चुनता ही रहा |

क्या कहूँ जबसे हूँ आया शहर में ,
गाँव की चाहत में घुनता ही रहा |
 
ज़िन्दगी रुई के फाहों की तरह ,
सांस की  तारों से धुनता ही रहा |
 
चाहतों की आग थी जलती रही ,
दिल मेरा खामोश भुनता ही रहा |
 
                  - अभिनव अरुण
                       { 25082012 }

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on September 2, 2012 at 2:03pm
परम श्रद्धेय श्री सौरभ जी आपकी टिप्पणी मेरी कलम को और ऊर्जस्वित करेगी ! हार्दिक आभार और साधुवाद |

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2012 at 10:11pm

ज़िन्दगी रुई के फाहों की तरह ,
सांस की तारों से धुनता ही रहा |

चाहतों की आग थी जलती रही ,
दिल मेरा खामोश भुनता ही रहा |

वाह वाह ! बहुत-बहुत बधाई, भाईजी.

Comment by Abhinav Arun on August 27, 2012 at 3:29pm

बहुत आभार आपका श्री योगी जी ग़ज़ल आपको पसंद आई प्रयास सार्थक हुआ !

Comment by Yogi Saraswat on August 27, 2012 at 10:36am
हर ग़ज़ल मेरी उदासी का किला ,
शेर दीवारों में चुनता ही रहा |

क्या कहूँ जबसे हूँ आया शहर में ,
गाँव की चाहत में घुनता ही रहा |
बहुत खूब , सुन्दर अल्फाजों से सजी हुई बढ़िया ग़ज़ल , अभिनव जी ! बधाई
Comment by Abhinav Arun on August 26, 2012 at 10:00pm
 बहुत बहुत आभार आदरणीया रेखा जी ,आदरणीया सीमा  जी ,श्री विन्धेश्वरी जी ,श्री संदीप जी और श्री सुजान जी . आपका उत्साह वर्धन मेरी प्रेरणा है |
Comment by Rekha Joshi on August 25, 2012 at 10:25pm

चाहतों की आग थी जलती रही ,

दिल मेरा खामोश भुनता ही रहा |,अरुण जी खूबसूरत ग़ज़ल ,हार्दिक बधाई 
Comment by seema agrawal on August 25, 2012 at 8:27pm

ऐसा बहुत ही कम हो पाता  है कि  किसी गज़ल का हर शेर कमाल का हो पाए पर अभिनव जी आपकी इस गज़ल में यदि छांटने लगूंगी तो शायद मुमकिन नहीं हो सकेगा .......जिस शेर को पढती हूँ बस वाह ही होती है बस ज्यादा तारीफ करने के लिए यही कह सकती हूँ

ऐसी गज़ले और लिखिए 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 25, 2012 at 7:26pm
चाहतों की आग थी जलती रही।
दिल मेरा खामोश भुनता ही रहा।

सच है आदरणीय अभिनव जी हर व्यक्ति अपनी इच्छा रुपी अग्नि में ही जलता है।वास्तव में पूरी गजल हर शब्द प्रशंसनीय है।सादर बधाई।
Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on August 25, 2012 at 7:12pm
आदरणीय अभिनव भईया..
क्या लाजवाब ग़ज़ल कही है आपने! दिल आनंदित हो उठा! विशेष तौर पर -
ज़िन्दगी रुई के फाहों की तरह ,
सांस की तारों से धुनता ही रहा; वाह , बहुत ख़ूब..!!
Comment by सूबे सिंह सुजान on August 25, 2012 at 5:05pm

वाह दिल से दाद कबूल करें............

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