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है ग़ज़ल ताज़ा कही तू या लिखी तहरीर है

संदली नाजुक बदन या बोलती तस्वीर है
आयतें खामोशियाँ हैं शर्म ये तफ़सीर है

सर्द हैं जुल्फों के साए सोज साँसों में भरी
कातिलाना है अदा या ख्वाब की ताबीर है

ये गजाली चश्म तेरे श्याह गहरी झील से
औ तबस्सुम होंठ पे जैसे कोई शमशीर है

हैं शहद अल्फाज उर्दू की रवानी भी निहाँ
है ग़ज़ल ताज़ा कही तू या लिखी तहरीर है

आपकी ही जुस्तुजू थी आपकी ही आरजू
आपका दीदार होना भी मेरी तकदीर है

मुफ्लिशी में इश्क की दौलत लुटाई आपने 
आपकी चाहत ही मेरी कीमिया जागीर है

"दीप" इन हर्फों में कैसे हो बयाँ जो है खुदा
नूर उनका क्या लिखूंगा ये तो बस तसगीर है

संदीप पटेल "दीप"

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Comment by Nilansh on September 9, 2012 at 8:25pm

इक सुंदर ग़ज़ल के लिए आपको बहुत बधाई संदीप जी 

Comment by satish mapatpuri on September 7, 2012 at 1:40am

मुफ्लिशी में इश्क की दौलत लुटाई आपने
आपकी चाहत ही मेरी कीमिया जागीर है

सुभान अल्लाह ....... बेहतरीन ..... बहुत खूब .... दाद कुबूल फरमाएं संदीप जी

Comment by वीनस केसरी on September 7, 2012 at 1:33am

यह प्रयास भी सम्पूर्णता को प्राप्त हुआ
आपका लगातार प्रयासरत रहना ही एक दिन आपको ग़ज़ल के विराट पर्वत में तल से शीर्ष पर ले जायेगा 
हार्दिक आभार एवं बधाई

अशुद्ध वर्तनी से मज़ा किरकिरा होता है
ज़रा ध्यान दें 

Comment by UMASHANKER MISHRA on September 6, 2012 at 7:48pm

आपकी ही जुस्तुजू थी आपकी ही आरजू
आपका दीदार होना भी मेरी तकदीर है

मुफ्लिशी में इश्क की दौलत लुटाई आपने 
आपकी चाहत ही मेरी कीमिया जागीर है

वाह वाह संदीप ....मान गये उस्ताद ..आपकी चाहत ही मेरी कीमिया जागीर है..क्या कहने है

Comment by Rekha Joshi on September 6, 2012 at 7:45pm

आपकी ही जुस्तुजू थी आपकी ही आरजू
आपका दीदार होना भी मेरी तकदीर है,बहुत खूब संदीप जी ,बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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