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राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३० (हमने कब यह सोच कर लिखा कि जो लिखा वो कोई गज़ल है)

हमने कब यह सोच कर लिखा कि जो लिखा वो कोई गज़ल है

चलनेवालेकी मंजिलपे नज़र है, नकि वो हवाओं में या पैदल है

 

अंदाज़ेतसव्वुर ने बदले हैं तरीकाए-तालीम-ओ-फहम दौरेके दौर  

कल जोकोई होगा बढ़के असद वो आज फकत बाशक्लेहमल है

 

बंदिशेबह्र-ओ-रदीफ़ोकाफिए के बगैर भी हो सकते हैं कलामेपाक

अल्लाहने जो बनाई है ये कायनात वो इक वाहिद सौतेअज़ल है   

 

शह्रमें होती हैं बसाहटें मकानोकस्बाओबाजारोशाहराह, क्याक्या

पे जाँ पे दिललगे मेरा वो मुकामेमजनूँ, वो नहीं तमद्दुन, जंगल है

 

मैं मानता हूँ राज़ मेरे अंदाज़ेसुखनमें हो सकती हैं कई खामियां

पे जो तू समझ जाए मेरा जज़्बा और मैं तेरा, ये बात अव्वल है

 

© राज़ नवादवी  

भोपाल, ०५.४७ संध्याकाल

गुरुवार, २०/०९/२०१२    

 

अंदाज़ेतसव्वुर- सोचने का तरीका; शिक्षाप्राणाली और समझाने का तरीका; असद- शेर, बाघ; बाशक्लेहमल- भेड़ के मेमने की शक में; बंदिशेबह्र-ओ-रदीफ़ोकाफिए – बह्र, रदीफ और काफिए के बंधन; वाहिद- अकेली; सौतेअज़ल- प्रारब्द्ध/ सृष्टि की ध्वनि; मुकामेमजनूँ – मजनूँ के रहने का स्थान; तमद्दुन- संस्कृति; अंदाज़ेसुखन- शायरी कहने का अंदाज़;  

   

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Comment by राज़ नवादवी on September 25, 2012 at 9:50pm

भाई वीनस जी, समझाने का शुक्रिया. वक्त दर्ज इसलिए भी करता हूँ कि जब आगे किसी औकात पीछे मुड़कर इन्हें कभी फिर से देखूं, पढूं, या निहारूं तो ये जान सकूं कि अपनी ज़िंदगी का वो कौन सा लम्हा था जब इन्हें कलम किया. इतना ही....

'बीती बातों से बेहतर ज़िंदगी का आइना क्या हो सकता है.

दिलकी बातोंसे कमतर खुदीका मुआइना क्या हो सकता है'

राज़  

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2012 at 11:37pm

राज साहिब आपने पोस्ट में रचना के साथ समय विशेष को भी टंकित किया है मेरा इशारा उस जानिब था

आप समय का विशेष ख़याल रखते हैं इसे देख कर दिल खुश हुआ तो खुशी का इज़हार कर दिया .....

Comment by राज़ नवादवी on September 21, 2012 at 7:43pm

जनाब उमा शंकर जी, इक अरसे के बाद आप से मुखातिब होते अच्छा लग रहा है. आपको हमारा कलाम भाया, ये जानकार हैं बेहद खुशी हुई. आपकी बधाई का शुक्रिया. 

-राज़ 

Comment by UMASHANKER MISHRA on September 21, 2012 at 12:04pm

वाह राज़ साहब ...मान गये 

बहेतरीन अंदाज़ में आपने उम्दा बात कही है 

दिल को छू गई.... मायने लिखने के लिए धन्यवाद 

हार्दिक बधाई 

Comment by राज़ नवादवी on September 21, 2012 at 9:36am

भाई वीनस जी, आपके अल्फाज़ पढ़कर बेसाख्ता ये कहने को जी चाहा- 

'आपको मज़ा आ जाता है तो हम भी गुनगुना लेते हैं

जैसे गुलाबी जाड़े में बराएगुस्ल पानी गुनगुना लेते हैं'

अरे साहेब, ये तो सौरभ भाई की दिलदारी है जो उस्ताद कह दिया, और हमने भी खाक्सारी में  सर झुका दिया क्यूंकि मुहब्बत में सर झुक ही जाते हैं. मगर ये बताएं कि मिनट मिनट के हिसाब का मुद्दआ क्या है जो हम ही से वाबस्ता है और हम ही आपसे पूछते हैं.?

सादर!  

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2012 at 1:02am

वाह वाह वा
राज साहिब तुसी तो मज़ा ला दित्ता
रचना की तो तारीफ़ ही क्या करूं अलबत्ता मिनट मिनट के आपके हिसाब ने अत्यंत प्रभावित किया

और जब सौरभ जी ने आपको उस्ताद कह कर संबोधित कर दिया है तो मेरे पास कहने को तो वैसे ही कुछ नहीं बचता है ,,,,

Comment by राज़ नवादवी on September 20, 2012 at 10:18pm

प्रिय प्रमेन्द्र जी, मैं आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ, और शुक्र गुज़ार हूँ कि आपको मेरी ये रचना पसंद आई.

मगर आजिज़ाना गुजारिश है, मैंने कोई जवाब देने के लिए नहीं लिखा, बस अपनी बात रखने के लिए और वो भी कैसे, खुद मालूम नहीं. चुनांचे किसी का दिल दुखा के मेरी तारीफ़ मेरा भी दिल दुखाएगी. 

आपका राज़ 

Comment by प्रमेन्द्र डाबरे on September 20, 2012 at 7:40pm

राज़ भाई क्या खूब जवाब है, कोई नहीं ग़र कोई चाँद को नहीं पहचानता तो उसकी आँखें ख़राब है........ प्रमेन्द्र डाबरे


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 20, 2012 at 7:30pm

बहुत खूब ! .. . समझ गया उस्ताद समझ गया.. .

सादर

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