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(चार चरण : विषम चरण

१२ मात्रा व सम चरण ७ मात्रा सम चरणों का अंत गुरु लघु से )

 

प्रात जागती नारी, नहिं आराम.

साथ नौकरी करती, है सब काम..

 

प्यार शक्ति दे तभी, उठाती भार.

नारी बिन यह दुनिया, है लाचार..

 

प्रेम स्नेह की करती, जग में वृष्टि.

पूजित नारी जग में, जिससे सृष्टि..

 

त्याग  तपस्या  सेवा, तेरे  नाम.

शक्ति स्वरूपा नारी, तुझे प्रणाम..

 

सत्ता मद में गर्वित, नर है आज.

अखिल विश्व में नारी, का ही राज..

__________________________

--इं० अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'

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Comment by Vinita Shukla on October 10, 2012 at 12:10pm

सुन्दर शब्दों में नारी की महिमा का बखान. बधाई एवं साधुवाद.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 9, 2012 at 11:57pm

स्वागत है राजेश कुमार झा साहब ! बहुत बहुत आभार भाईजी ! यहाँ पर हम सभी परस्पर सहयोग से एक दूसरे को सीखते सिखाते हैं ....

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 9, 2012 at 11:54pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय लड़ीवाला जी !

बरवै से तात्पर्य है...... कुरंग/ तामड़े या बादामी रंग का हिरन या ध्रुव ! सादर

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 9, 2012 at 11:52pm

अनुज संदीप जी,  सर्वप्रथम बरवै छंदों की सराहना के लिए बहुत -बहुत आभार ! आपका मृदु व्यवहार मन को आनंदित कर देता है ! सस्नेह शुभाशीष !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 9, 2012 at 11:49pm

स्वागत है भाई अशोक कुमार रक्तले जी ! बरवै छंदों की सराहना के लिए बहुत -बहुत बधाई !

आपकी प्रश्न के अनुसार 'बरवै' की परिभाषा प्रस्तुत है ...

शब्दकोष के अनुसार ...

बरवै : १९ मात्राओं का एक छंद जिसमें १२ और ७ मात्राओं पर यति और अंत में 'जगण' होता है अर्थात एक ऐसा छंद जिसके विषम अर्थात् पहले और तीसरे चरणों में बारह-बारह और सम अर्थात् दूसरे और चौथे चरणों में सात-सात मात्राएँ होती है बरवै कहलाता है | सम चरणों की अंतिम चार-चार मात्राओं का  जगण  के रूप में होना आवश्यक (रोचक) होता है। इसे 'ध्रुव' और 'कुरंग' भी कहते हैं ।

छंद प्रभाकर के रचयिता श्री जगन्नाथ प्रसाद भानु जी  के अनुसार बरवै के अंत में जगण होना रोचक होता है परन्तु तगण का प्रयोग भी देखा जाता है ! अर्थात उनके उपरोक्त कथन से यह स्वतः ही स्पष्ट है कि बरवै का अंत जगण होने से रोचकता तो है पर इसकी अनिवार्यता नहीं है !

नवीन चतुर्वेदी जी के अनुसार बरवै के अंत में केवल गुरु-लघु आवश्यक है !

बरवै छंद

12+7=19 मात्रा वाला मात्रिक छंद

दोहे की तरह दो चरण - चार पद

पहला और तीसरा पद 12 मात्रा 

दूसरा और चौथा पद 7 मात्रा

दूसरे और चौथे पद के अंत में गुरु लघु अक्षर 

Comment by राजेश 'मृदु' on October 9, 2012 at 5:09pm

आप जब भी आते हैं बहुत कुछ दे जाते हैं, पहली बार बरवै का छंद विधान पढ़कर सीखने को मिला, सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 9, 2012 at 1:12pm

बरवै का क्या अर्थ होता है भाई श्री अम्बरीश जी 

तुलसी के पेड़ को कहते है क्या ? सुन्दर छंद रचना 

त्याग तपस्या के आगे तो नत मस्तक है ही | बधाई 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on October 9, 2012 at 1:02pm

आदरणीय अम्बरीश सर जी सादर प्रणाम
बहुत उम्दा बरवै छंद रचे हैं आपने
सीखने के सार सुअवसर प्रदान करती रचना हेतु साधुवाद आपको

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 9, 2012 at 8:00am

आदरणीय अम्बरीश जी

                       सादर प्रणाम, बहुत सुन्दर बरवै छंद पर बधाई स्वीकारें. मै  प्रथम बार ही पढ़ रहा हूँ कृपया कुछ जानकारी और दें कि क्या इसमें भी सम चरण का अंत गुरु लघु से ही करना अनिवार्य है?

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 8, 2012 at 11:05pm

आदरेया राजेश कुमारी जी, बरवै छंद की सराहना के लिए सादर धन्यवाद स्वीकारें !

कृपया ध्यान दे...

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