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रोज की तरह मंदिर के सामने वाले पीपल के पेड़ की छाँव में स्कूल से आते हुए कई बच्चे सुस्ताने से ज्यादा उस बूढ़े की कहानी सुनने के लिए उत्सुक  आज भी उस बूढ़े के इर्द गिर्द बैठ गए और बोले दादाजी दादा जी आज भूत की कहानी नहीं सुनाओगे ?नहीं आज मैं तुम्हें इंसानों की कहानी सुनाऊंगा बूढ़े ने कहा-"वो देखो उस घर के ऊपर जो कौवे मंडरा रहे हैं आज वहां किसी का श्राद्ध मनाया  जा रहा है, उस लाचार बूढ़े का जो पैरों से चल नहीं सकता था पिछले वर्ष उसकी खटिया जलने से मौत हुई थी उसकी खाट के पास उसकी बहू ने  एक छोटी सी स्टूल पर भगवान् की फोटो रखी और कुछ अगर बत्तियां | सोते हुए बूढ़े के हाथ में माचिस और एक अगर बत्ती पकड़ा दी और उसके बिछौने के चारो कोनों में आग लगा कर दरवाजा भिड़ा कर चली गई सुबह आग की लपटों को देख आस पास के लोगों ने बूढ़े को अधजला मृत पाया और बात फ़ैल गई कि पूजा करते हुए बिस्तर में चिंगारी लग गई और ये हादसा हो गया | जीते जी तो इंसानों की कद्र नहीं करते और मरने के बाद देखो कैसा जश्न मना रहे हैं और देखो जो  आज भोजन की थाली में हलुआ रखा है  ना उस हलुए के लिए मैं  हमेशा तरसता- तरसता चला गया | बच्चों ने , जो अभी तक कौवों को ही देख रहे थे यह सुनते ही अचानक जो पलट कर देखा वो बूढा दादा जी गायब था और बच्चे अनसुलझी पहेली को सुलझाने में लगे थे |

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Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 15, 2012 at 4:12pm

आपका स्वागत है आदरेया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 15, 2012 at 2:09pm

दिल से आभारी हूँ विनीता शुक्ला जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 15, 2012 at 2:08pm

अनसुलझी पहेली का इतना बढ़िया सार्थक विश्लेषण के लिए हार्दिक आभार आदरणीय अम्बरीश जी

Comment by Vinita Shukla on October 15, 2012 at 12:58pm

बुजुर्गों के प्रति असंवेदनशीलता का मार्मिक चित्रण करने वाली कथा. सार्थक प्रस्तुति हेतु बधाई.

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 13, 2012 at 11:54pm

आदरेया राजेश कुमारी जी ! अपना दायित्व निभाने से बचने के चक्कर में आज का स्वार्थी इंसान किस हद तक गिर  इसका अब कोई पैमाना ही नहीं रहा .... इस अच्छी लघुकथा के लिए बहुत बहुत बधाई ! आदरणीय सौरभ जी ने भी ठीक ही कहा है कथा के अंत की अनसुलझी पहेली सुलझाने में वे बच्चे अवश्य ही डरे होंगे !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 13, 2012 at 5:51pm

आदरणीय रेखा जी बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Rekha Joshi on October 12, 2012 at 10:14pm

आदरणीया राजेश जी 

जीते जी तो इंसानों की कद्र नहीं करते और मरने के बाद देखो कैसा जश्न मना रहे हैं ,आजकल यही तो हो रहा है ,जीते जी अपने बुजुर्गो को पूछते नही और मरने के बाद .......,सार्थक लघु कथा बधाई 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 12, 2012 at 7:15pm

आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद लडिवाला वाला जी हार्दिक आभार आपको कहानी पसंद आई 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 12, 2012 at 5:54pm
बहुत अच्छा सन्देश देती लघु कथा अब बूढ़े माँ-बांप का  
स्वर्वासी होने के बाद अपने स्वार्थ के लिए आशीर्वाद लेने और 
अपना रुतबा दिखाने के लिए किया जा रहा है | पुनः बधाई   

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 12, 2012 at 2:20pm

आदरणीय सौरभ जी बहुत बहुत हार्दिक आभार कहानी के मर्म का इतना सुन्दर विश्लेषण करने के लिए |

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