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किस तरह हो यकीं आदमी का |
कोई होता नहीं है किसी का ||

आस्तीनों में खंजर छुपा कर |
दे रहे हो सबक़ दोस्ती का ||

पत्थरों के मकानों में रह कर |
दिल भी पत्थर हुआ आदमी का ||

मान लें बाग़बाँ कैसे उसको |
जिसने सौदा किया हर कली का ||

दर्द का बाँट लेना इबादत |
फ़लसफ़ा है यही ज़िन्दगी का ||

इसको आज़ादी माने तो कैसे |
आदमी है ग़ुलाम आदमी का ||

फैलें इंसानियत के उजाले |
सिलसिला ख़त्म हो तीरगी का ||

अश्क आँखों में है या सितारे |
बन गया सिलसिला रौशनी का ||

ज़ख़्मे – दिल फिर हरा हो गया है |
शुक्र है आँसुओं की नमी का ||

वो भी तो है ‘लतीफ़’ आदमी जो |
पी रहा है लहू आदमी का ||


©लतीफ़ ख़ान (दल्ली राजहरा)

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Comment

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Comment by लतीफ़ ख़ान on November 5, 2012 at 9:47pm

आली जनाब नादिर साहिब , आप जैसे सुखन परवर हों तो हम जैसे नाचीज़ सुखनवरों को हौसला और हिम्मत मिलती है

जनाब नादिर साहब , आप जैसे सुखन परवरों की बदौलत ही हम जैसे नाचीज़ सुखनवर ज़िन्दा हैं | आप ने हौसला अफज़ाई की तहे - दिल से शुक्र गुज़ार हूँ |

Comment by लतीफ़ ख़ान on November 5, 2012 at 9:27pm

आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी ,नाचीज़ की रचना को आप ने सराहा ...ममनूनो -मशकूर हूँ | आइन्दा भी आप के सुझाव और मशविरों का तालिब

Comment by लतीफ़ ख़ान on November 5, 2012 at 9:20pm

श्री वीनस केसरी जी ,आप की हौसला अफज़ाई के लिए शुक्रिया .....मै ने आप की रचनाएँ गुफ़्तगू में पढ़ी हैं | आप तो वैसे भी मशहूर ओ मआर्रुफ़ शायर हैं | आप से दाद मिली ...ज़हे-नसीब |

Comment by shalini kaushik on October 28, 2012 at 11:51pm

पत्थरों के मकानों में रह कर |
दिल भी पत्थर हुआ आदमी का ||

 सार्थक भावपूर्ण प्रस्तुति बधाई 

Comment by वीनस केसरी on October 26, 2012 at 10:28pm

एक बार फिर से आपने मंच को पुख्ता ग़ज़ल से नवाजा है
तहे दिल से ढेरों दाद

Comment by नादिर ख़ान on October 25, 2012 at 12:48pm

पत्थरों के मकानों में रह कर |
दिल भी पत्थर हुआ आदमी का ||

bahut umda baat kahi hai apne 

(jab mitti ke gharon me rahte the to mitti ki khushboo bhi thi aur dil bhi narm tha mitti ki tarah )


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 25, 2012 at 10:18am

//आस्तीनों में खंजर छुपा कर |
दे रहे हो सबक़ दोस्ती का ||
//

वाह जनाब वाह, बहुत ही उम्दा कहन है, सभी शेर बढ़िया कहें हैं, बधाई कुबूल करें |

Comment by Anil chaudhary "sameer" on October 25, 2012 at 10:15am
वाह लतीफ़ जी, बहुत ही सुन्दर भावों को प्रदर्शित करती आपकी ग़ज़ल, काबिले तारीफ़ है ! 

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