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राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-४१ (बाकी रह गया इक शख्स जो राज़ नवादवी है)

दिन ऐसे गुज़र जाते है जैसे हाथ से ताश के पत्ते. देखते देखते महोसालोदहाई सर्फ़ हो गए, कहाँ गए सब? ज़िंदगी में जो बीत गया, किधर चला चला गया? जो लोग अब नहीं हैं तकारुब में और जिनके मख्फी साये ही ज़हन में आते जाते हैं, वो कहाँ हैं अभी? ख्वाहिशों से भी मुलायम सपने जो कभी पूरे नहीं हुए, उदासियों सी भी तन्हा कोई राहगुज़र जो कभी मंजिल तक न पहुँच पाई, दिल की सोजिशों से भी रंजीदा इक नज़र जो झुक गई मायूसियों के बोझ तले- क्या हुआ उनका?

 

तुम्हारे गाँव का वो खाली खाली घर जहाँ बसी है आईने के सामने संवरते तुम्हारे गुनगुनाने की सदा, तुम्हारे आँचल की गिरह में बंधा गेंदे का फूल जिसे मैंने छुपा दिया था खेल खेल में तुम्हारे जूड़े से चुराकर, तुम्हारी आँखों का तवील खिंचा काजल जिसका इक रेज़ा आ लगा था मेरे शाने से लहराकर-  तसव्वुरों में ज़िंदा इन लम्हों का सच न जाने किधर खो गया?

 

तुम नहीं हो मगर तुम्हारे ख्याल की कशिश आज भी उसी शिद्दत से बरकरार है. ये कशिश एक शिकस्ता दिल की ठंढी आह ही तो है, जो माज़ी की सरसब्ज़ यादों के तजाजुब के ज़ेरेअसर कहीं जाती भी नहीं, वरना गर्म हो के आसमान का रुख न ले लेती? हा हा हा हा ! दिल कहाँ बसता है कहीं? भोपाल में तो बस... हम रहते हैं. दिल तो सुदूर पूरब के कोहसार में खो गया कहीं और बाकी रह गया इक शख्स जो राज़ नवादवी है.

 

© राज़ नवादवी, भोपाल

मंगलवार ३०/१०/२०१२ अपराह्न ०३.०५

महोसालोदहाई- महीने साल और दशक; तकारुब- समीपता; मख्फी- छुपा हुआ, अदृश्य; सोजिश- जलन, प्रदाह; रंजीदा- संतप्त, ग़मगीन; सदा- आवाज़; तवील- लंबा, दीर्घ; रेज़ा- कण, कतरन, बहुत छोटा टुकड़ा; तसव्वुर- ख्याल; कशिश- आकर्षण, खिंचाव; शिद्दत- तीव्रता; शिकस्ता- टूटा; माज़ी- अतीत; सरसब्ज़- हरे-भरे; तजाजुब- गुरुत्वाकर्षण; ज़ेरेअसर- प्रभाव में; कोहसार- घाटी, उपत्यका; 

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Comment by राज़ नवादवी on November 16, 2012 at 9:37am

शुक्रिया भाई सौरभ  जी! विलम्ब से प्रत्युत्तर हेतु क्षमा! सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2012 at 10:37am

भाईजी, बच्चन के शब्द-पुष्प साझा कर रहा हूँ --

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का
विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला !!

शुभेच्छाएँ

Comment by राज़ नवादवी on November 1, 2012 at 9:27pm
धन्यवाद भाई लक्षमण जी. तहेदिल से शुक्रिया कि आपने मेरे लिखे को पसंद किया! मेरे लिए डायरी लेखन स्मरण की पराकाष्ठा है, अतीत को फिर से जी कर वर्तमान में पुनः लौट आना. चुनांचे, लिख के भूल जाता हूँ, बातें ज़हन से निकल जाती हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा ही हो जाता है. इतना ही.

सादर!
Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 31, 2012 at 3:14pm

आपकी डायरी के पन्नो में बहुत से यादे खोंस रक्खी है, जो अब एक एक कर सामने आ रही है |हम भी लुफ्त उठा रहे है | जो गंदे का फूल छुपा दिया था, और जो काजल का रेजा आपके शाने से आ लगा था,उनकी यादे आपको सताती होगी | मगर अपने इस पन्ने पर रोज फूल पंखुड़ी तो रखते हो न आप ? गद्य रचना भी बेहद पसंद आई, बधाई राज नवा दवी भाई  

Comment by राज़ नवादवी on October 31, 2012 at 12:52pm

आपका बहुत बहुत शक्रिया आदरणीया राजेश जी. आपकी दाद पाके दिल खुशी से फूले नहीं समा रहा है.

सादर!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 31, 2012 at 12:38pm

काव्य के आलावा गद्य रचना में भी किसी की याद में इतने खूबसूरत शब्द घड देना कोई आप से सीखे बहुत खूबसूरत एहसास लाजबाब संस्मरण 

कृपया ध्यान दे...

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