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धड़कनें जलती बुझती रही रात भर...

दिल की लौ थरथराती रही रात भर,
धड़कनें जलती बुझती रही रात भर।

गिर के खुद ही सम्भलती रही रात भर,
ज़िन्दगी लड़खड़ाती रही रात भर।

मैंने रब से भी कितनी ही फरियाद की,
एक तसल्ली ही मिलती रही रात भर।

बुझ न जब तक गई इन चराग़ों की लौ,
तेज़ आँधी ही चलती रही रात भर।

शाम घिरने से लेके सहर खिलने तक,
दर हवायें बजाती रही रात भर।

उसका वादा था वो पर नहीं आ सका,
ये खलिश दिल जलाती रही रात भर।

जब हवा रात भर ठंडी ठंडी चली,
फिर क़बा क्यों सुलगती रही रात भर।

उसकी आँखें वो ज़ुल्फ़ें वो दिलकश अदा,
आँखों में आती जाती रही रात भर।

दिल ये कहता था आयेगा वो आयेगा,
यूँ तबीयत मचलती रही रात भर।

उसकी तस्वीर आ आके दीवार पे,
एक धुँधली उभरती रही रात भर।

उसके कूचे से आई मेरे घर सबा,
उसकी खुशबू जगाती रही रात भर।

बाद मरने के भी एक हवा सरफिरी,
खाक मेरी उड़ाती रही रात भर।

मन से पूछूँ तो बोले वो अब गैर है,
रूह लेकिन मुकरती रही रात भर।

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Comment

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Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on November 16, 2012 at 12:17pm

शाम घिरने से लेके सहर खिलने तक,
दर हवायें बजाती रही रात भर -- सुन्दर शे'र इमरान भाई..

Comment by इमरान खान on November 16, 2012 at 10:50am
इस शेर को दोबारा देखें.

इक हवा तो भले ठंडी* ठंडी चली,
पर क़बा तन जलाती रही रात भर।
Comment by इमरान खान on November 16, 2012 at 10:43am
सौरभ भैय्या इता दोष गुंजाइश खत्म करके मैं गज़ल दोबारा डाल रहा हूँ, दोबारा देखने की दरख्वास्त है,
*गिराई गई मात्रा

दिल की* लौ थरथराती रही रात भर,
धड़कनें कँपकपाती रही रात भर।

मिट के* खुद को बनाती रही रात भर,
ज़िन्दगी लड़खड़ाती रही रात भर।

मैंने* रब से जो* रो रो के* फरियाद की,
इक तसल्ली तो* आती रही रात भर।

जिन चराग़ों को* भी मैंने* रोशन किया,
तेज़ आँधी बुझाती रही रात भर।

शाम घिरने से* लेके सहर खिलने* तक,
दर हवायें बजाती रही रात भर।

उसका* वादा था* वो पर नहीं आ सका,
ये खलिश दिल जलाती रही रात भर।

इक हवा ठंडी* ठंडी चली थी मगर,
ये क़बा तन जलाती रही रात भर।

उसकी* आँखें वो* ज़ुल्फ़ें वो* दिलकश अदा,
दीद में आती* जाती रही रात भर।

एक तस्वीर धुँधली सी* दीवार पे,
ये निगाहें बनाती रही रात भर।

कूचे से उसके* आई मेरे घर सबा,
उसकी* खुशबू जगाती रही रात भर।

बाद मरने के* भी इक हवा सरफिरी,
खाक मेरी उड़ाती रही रात भर।

सारे* किस्से हसीं मेरे* दिलदार के,
रूह मुझको सुनाती रही रात भर।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 16, 2012 at 6:21am

//मैं वाकई यहाँ सक्रिय रहा, मैं पहले आयोजनों में भाग लिया करता था मगर जब 2 आयोजन छन्दाधारित हुए हैं मेरा पत्ता साफ हो गया,//

इमरानभाई, जब-जब आयोजन छंद आधारित नहीं हुए बल्कि मात्र एक आयोजन  --’चित्र से काव्य तक’--  जो कि एक प्रतियोगिता भी है को शास्त्रीय छंद आधारित किया गया है. जबकि ’मुशायरा’ अपने नाम के अनुरूप अभी तक तरह पर आधारित एक इण्टरऐक्टिव नेचर का ‘ओन-लाइन मुशायरा है. अन्य सारे आयोजन अपनी प्रकृति के अनुरूप ही हैं.

ओबीओ पर इस बात का यथासंभव ध्यान रखा गया कि विशेषकर हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं को समान अवसर मिले ताकि सभी विधाओं पर बखूबी काम हो सके. कमसे कम पद्य प्रभाग में (जबकि गद्य में भी) शायद ही कोई विधा हो जिस पर रचनाकारों को प्रोत्साहन नहीं मिलता.

आगे, यह अवश्य ही रचनाकारों पर निर्भर करता है कि वे मंच को कितना समय दे पाते हैं और वस्तुतः कितनी संलग्नता से विधानुरूप रचनाकर्म कर पाते हैं.

यह अवश्य है, इमरान भाई, कि तथाकथित कई ’जानकारों’ को अवश्य ही ’झटके’ लगते हैं जब उन्हें विधानुरूप ’सीख’ मिलती है. देखा गया है कि अक्सर उदाहरणों में ’जानकार’ रचनाकार ’सीखने’ की जगह यह बर्दाश्त तक नहीं कर पाते कि उनको ’सीखने’ की भी आवश्यता है. जबकि नये रचनाकार अपनी संलग्नता और मनोयोग से बेहतर परिणाम ला रहे हैं.

यह तो आप भी अवश्य मानेंगे कि ओबीओ का उद्येश्य कभी किसी रचनाकार की हेठी करना नहीं, बल्कि साहित्य की विधाओं के मानकों के अनुरूप रचनाकर्म हेतु उत्साहित तथा प्रेरित करना रहा है.

Comment by वीनस केसरी on November 16, 2012 at 12:59am

आदरणीय,
सुन्दर भावाभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें
सादर

Comment by इमरान खान on November 16, 2012 at 12:54am
आपकी टिप्पणी का आभार सौरभ भैय्या।

मैं वाकई यहाँ कम सक्रिय रहा, मैं पहले आयोजनों में भाग लिया करता था मगर जब 2 आयोजन छन्दाधारित हुए हैं मेरा पत्ता साफ हो गया, तरही मुशायरे के लिए मैंने गज़ल तैयार कर ली है समय पर पोस्ट करूँगा।

गज़ल पर और बेहतरी के लिए नये पाठ भी मुझे पढ़ने होंगे।

मात्रा गिराने की जहाँ तक बात है, जब से मैं गुनगुनाना सीखा हूँ कि मिसरा आसानी से गुनगुनाने पर तो मात्रा गिर कितनी गिरी ध्यान ही नहीं करता।

मैंने गज़ल में काफिया ता लिया है, जहाँ तक मेरा ज्ञान है, इता दोष यहाँ नहीं है, अगर है तो ज़रा सा समझा दीजियेगा।

आप सही कह रहें इक के साथ ज़्यादा आसानी से कहा जा रहा है।

सौरभ भैय्या मैं जब से यहाँ आया हूँ मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैंने आज तक वर्ना को मुशायरा अटैंड तक नहीं किया। अच्छा लगता है जब मैं अपनी गज़ल को धुन के साथ गुनगुना पाता हूँ,
अकेला रहने के कारण शायद मुझमें सार्वजनिक स्थल पर कैसे बात होती है यह ज्ञान ही नहीं

मैं कभी कभी टिप्पणी में कहना कुछ और चाहता हूँ और मेरे शब्द कुछ और कह देते हैं, अगर आपको मेरी किसी बात का बुरा लगे तो छोटा भाई समझकर सीधे बोलियेगा, अपनी छत्रछाया बनाये रखियेगा।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 15, 2012 at 11:03pm

इमरान भाई, इधर आपकी लगातार मौज़ूदग़ी इत्मिनान कर रही है कि शायद आप अपनी व्यस्तता से आवश्यक समय निकाल पा रहे हैं.

इधर की अनुपस्थिति के पहले ग़ज़ल पर आपका बेहतर प्रयास होने लगा था. कोशिश कीजिये कि उसपर फिर से काम शुरु हो सके.

मतले को फिर से देखियेगा. क्या इता दोष तो नहीं बन रहा है.

ग़ज़ल के अश’आर २१२ २१२ २१२ २१२ के वज़्न पर बाँधे गये हैं लेकिन लगातार मात्राएँ गिराना थोड़ा कसक रहा है.

बाद मरने के भी एक हवा सरफिरी .. .  इस मिसरे में एक को इक किया जाय न !

Comment by ajay sharma on November 15, 2012 at 10:53pm

उसके कूचे से आई मेरे घर सबा,
उसकी खुशबू जगाती रही रात भर।    bahut khoob

मैंने रब से भी कितनी ही फरियाद की,

एक तसल्ली ही मिलती रही रात भर।  wah wah 

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