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लघुकथा- 'दिल' और 'दिमाग'

बहुत पहले 'दिल' और 'दिमाग' अच्छे दोस्त हुआ करते थे। उनका उठना-बैठना, देखना-सुनना, सोचना-समझना और फैसले लेना, सब कुछ साथ-साथ होता था।
फिर इक रोज़ यूँ हुआ कि 'दिल' को अपने जैसा ही एक हमख्याल 'दिल' मिला। दोनों ने एक दूसरे को देखा और देखते ही, धड़कनों की रफ़्तार बढ़ी सी मालूम हुई। मिलना-जुलना बढ़ा तो कुछ रोज़ में, दिलों की अदला-बदली भी हो गयी। अब एक दिल मचलता तो दूसरे की धड़कने भी तेज हो जातीं; एक रोता तो दूजे की धड़कने भी धीमे होने लगतीं। बस एक दिक्कत थी कि दोनों सही फैसले नहीं कर पाते थे। वज़्ह कि फैसले दिमाग लेता है और वो अब दिल से दूर हो चुका था। वैसे भी अगर आप, दो लोगों के बीच खड़े हों और अचानक से किसी एक की ओर रुख़ करके चलने लगें, तो दूसरा खुद-ब-खुद दूर हो ही जाएगा।
फिर एक रोज़ 'दिमाग', 'दिल' को समझाने लगा- "यूँ ही, बिला-वज़ह, किसी से दिल लगा लेना, ठीक नहीं। ख़ुद की परेशानियाँ ही क्या कम हैं, जो बेवज़ह दूसरे के लिए परेशान रहें..? दूसरों के लिए धड़का करें..? जब अपने ज़ज्बात ही नहीं संभाले जाते, तो फालतू में दूसरों के ज़ज्बात को क्यूँ ढोते फिरें..?" अब सोचना और समझना, दिल का काम तो है नहीं। आखिरकार आ ही गया, दिमाग की बातों में...। थोड़ा रो-धोकर अपने हमख्याल दिल को भी छोड़ ही दिया। पर अब वो 'दिल' नहीं रह गया था। 'दिमाग' में तब्दील हो चुका था।

(चित्र- गूगल से साभार)

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Comment by seema agrawal on December 1, 2012 at 12:46pm

दिल-दिमाग ,दिमाग दिल बढ़िया .....बहुत बढ़िया कथा 

//दिलों की अदला-बदली भी हो गयी।// सवाल ये है विवेक भाई की दिमाग ने आखिर किसके दिल से बात की :))

Comment by विवेक मिश्र on November 28, 2012 at 12:38am

हार्दिक आभार शालिनी जी.

Comment by shalini kaushik on November 28, 2012 at 12:29am

बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति   .बधाई 

Comment by विवेक मिश्र on November 27, 2012 at 8:55pm

लक्ष्मण प्रसाद लाडीवाला जी- इस दिमागी कसरत को पसंद करने के लिए आभार आदरणीय.

Comment by विवेक मिश्र on November 27, 2012 at 8:51pm

रविकर जी- सराहना के लिए धन्यवाद आदरणीय.

Comment by विवेक मिश्र on November 27, 2012 at 8:50pm

बागी भाई- वैसे तो लिखने की कोशिश दिल से ही हुई थी (सुबह ४ बजे तक), पर यदि परिणाम 'गुड़मुड़ गुड़मुड़ गुडुप' हुआ तो इसमें दोष लेखक का ही है. तथापि प्रयास जारी है. :-)
जय हो !!!

Comment by विवेक मिश्र on November 27, 2012 at 8:44pm

सौरभ सर- ओबीओ पर कोई भी रचना आपकी टिप्पणी से पूर्ण होती है. अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार.

"ऐ महाराज.. दिलवा अभी ले ता संगही बा. बाकी, कब ले रही, एकर गारण्टी नइखे. :-)))"

Comment by विवेक मिश्र on November 27, 2012 at 8:26pm

डॉ.प्राची जी- रचना में उलझने के लिए धन्यवाद. :)

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 27, 2012 at 7:10pm

दिल और दिमाग के मध्य वार्ता की अच्छी कसरत की है, बधाई 

Comment by रविकर on November 27, 2012 at 4:52pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय ।

बधाई स्वीकारें ।।

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