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उस साल
कहर सी थी सर्दी
ठिठुरन बढ़ रही थी
हमने जेहन में खड़े कुछ दरख्त काटे
और जला लिए कागज़ पर
ज्यादा तो नहीं मगर हाँ....
थोड़ी तो राहत मिल ही गयी
पास से गुजरते हुए लोग भी
तापने के लिए बैठने लगे
अलाव धीरे धीरे... महफ़िल सा बन गया
 अलाव जब बुझ गया ..लोग चले गये
फिर तो
रोज़ ही हम कुछ दरख्त काट लाते
रोज़ अलाव जलता रोज़ ही लोग आते
इस तरह हर रोज़ महफ़िल सजने लगी
मगर एक ताज्जुब ये था कि
रोज़ ही काटे जाने पर भी
दरख्त कभी कम नहीं होते थे
एक भी नही....

-पुष्यमित्र

 

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Comment by ajay sharma on December 11, 2012 at 10:14pm

मगर एक ताज्जुब ये था कि
रोज़ ही काटे जाने पर भी 
दरख्त कभी कम नहीं होते थे
एक भी नही.... in fact this the difference between human being & nature , nature makes you happy & prosperous by sacrifice of even its each & every leaf  & nothing is demanded  from its side .while human beings are with you as long as you reciprocate them equally 

Comment by Dr.Ajay Khare on December 11, 2012 at 5:01pm

kintu ye sisila jyada nahi chalne bala .ab body warmer pahne save darakht

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 11, 2012 at 1:26pm

वाह क्या बात कही, सादर 

बधाई. 

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