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(पूर्णतया काल्पनिक, वास्तविकता से समानता केवल संयोग)

बहुत समय पहले की बात है। जंगल में शेर, लोमड़ी, गधे और कुत्ते ने मिलकर एक कंपनी खोली, जिसका नाम सर्वसम्मति से ‘राष्ट्रीय वन निगम’ रखा गया । गधा दिन भर बोझ ढोता। शाम को अपनी गलतियों के लिए शेर की डाँट और सूखी घास खाकर जमीन पर सो जाता।  कुत्ता दरवाजे के बाहर दिन भर भौंक भौंक कर कंपनी की रखवाली करता और शाम को बाहर फेंकी हड्डियाँ खाकर कागजों के ढेर पर सो जाता। लोमड़ी दिन भर हिसाब किताब देखती। हिसाब में थोड़ा बहुत इधर उधर करके वो शाम तक अपने भविष्य के लिए कुछ न कुछ जमा कर लेती। शाम को लोमड़ी के काम के बदले उसे बचा हुआ मांस मिलता जिसे खाकर वो कंपनी से मिले मकान में जाकर सो जाती।

शेर दिन भर अपनी आराम कुर्सी पर बैठे बैठे दो चार जगह फोन मिलाता। तंदूरी मुर्गा खाता। हड्डियाँ दरवाजे पर फेंक देता और पेट भरने के बाद बचा हुआ मुर्गा लोमड़ी के पास भिजवा देता। शाम को गधे के पास जाकर पहले उसे डाँटता फिर और ज्यादा ध्यान से बोझ ढोने के लिए बोलता। यह सब करने के बाद वो अपने महल में मखमल के गद्दे पर जाकर सो जाता। चारों जानवर इस व्यवस्था से बड़े प्रसन्न थे और सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने अपने बच्चों को भी उसी काम में लगा दिया।

तब से यही सिस्टम चला आ रहा है। आज तक लोमड़ी गधे या कुत्ते के वंशजों ने शेर के कमरे में झाँककर यह जानने की कोशिश नहीं की कि वो आखिर दिन भर करता क्या है?

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2012 at 6:00pm

seema agrawal जी, जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि आप भी एनटीपीसी परिवार से हैं। लघुकथा पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2012 at 5:59pm

Laxman Prasad Ladiwala जी, बहुत बहुत धन्यवाद। स्नेह बनाए रखें।

Comment by seema agrawal on December 13, 2012 at 5:31pm

बहुत खूब धर्मेन्द्र जी ...आपकी इस कहानी को पढ़ कर एक कहानी याद आरही है जो NTPC में बहुत प्रचलित है (मैं भी इसी परिवार से हूँ )........एक तोते वाले के पास  तीन तोते थे एक १०० का दूसरा १००० का उर तीसरा १०००० का ...लोगों ने पूछा तीनो में क्या अंतर है .

तोते वाले ने बोला १०० रुपये वाला तोता इस संसार में होने वाली हर  एक बात का जानकार है  
....................१००० रुपये वाला ,जो  हो चुका है वो जानता है,जो  हो रहा है वो भी जानता है और जो होने वाला है वो भी बता सकता है 

...................१०००० रुपये वाला कुछ नहीं जानता ........पर ये इतना मंहगा इसलिए है क्योंकि बाकी के दोनों तोते इसे boss कहते हैं 


तो बस boss के कमरे में तो झांकना वैसे भी मना  है न 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 13, 2012 at 5:04pm
वाह भाई धर्मेन्द्र जी संयोग ही सही, वास्तविक तो यही है जो कहानी से उजागर हो रही है ।
वफादार कुत्ता (ईमानदार चोकीदार) गधे का जन्म हुआ ही दिन भर बोझा ढोने को 
हुआ है, लात भी खाता रहता है और लोभी स्वाभाव की लोमड़ी, मिले उसे क्यों छोड़े । अब 
जब इनमे ताका-झांकी कर दखल देने की आदत नहीं तो राजा शेर हो या फिर सरकारी सांड,
इनको डर क्या । जितना लूट सके मजे लूट । सुन्दर कहानी, बड़े बड़े कारपोरेट घराने इन सब 
वफादारो के बल पर ही गगनचुम्बी इमारते कड़ी करते जा रहे है । हार्दिक बधाई ।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 13, 2012 at 4:51pm

SANDEEP KUMAR PATEL जी, बहुत बहुत शुक्रिया जनाब।

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 13, 2012 at 4:43pm

सच कहा सर जी सिस्टम तो वही चला आ रहा है
न बोंस की सोच बदली न कर्मचारियों की बस चल रहा है जी
सुन्दर रचना पर बधाई सर जी

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