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लड़खड़ाते पांव मेरे - जबकि मैं पीता नहीं

याद में तेरी जिऊँ, मैं आज में जीता नहीं,
लड़खड़ाते पांव मेरे, जबकि मैं पीता नहीं,

नाज़ नखरे रख रखें हैं, आज भी संभाल के,
मैं नहीं इतिहास फिरभी, सार या गीता नहीं,

तोलना है तोल लो तुम, नापना है नाप लो,
प्यार मेरा है समंदर, यार दो बीता नहीं,

आह निकलेगी नहीं, तुम लाख चाहो भी सनम,
दर्द की आदत मुझे है, मैं जखम सीता नहीं,

चाहता हूँ भूलके सब, दो कदम आगे चलूँ,
और खुद तकदीर से मैं अबतलक जीता नहीं.

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Comment

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Comment by पीयूष द्विवेदी भारत on December 18, 2012 at 9:42am

दमदार गज़ल अरुन भाई ! पूरी गज़ल बढियां, पर  इन दो असआरों के लिए विशेष दाद कबूलें !

आह निकलेगी नहीं, तुम लाख चाहो भी सनम,
दर्द की आदत मुझे है, मैं जखम सीता नहीं,

चाहता हूँ भूलके सब, दो कदम आगे चलूँ,
और खुद तकदीर से मैं अबतलक जीता नहीं.

Comment by Dr.Ajay Khare on December 17, 2012 at 2:53pm

bina piye hi per ladkhdate he khusbaseeb he badhai

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 17, 2012 at 11:57am

वीनस भाई आपको रचना पसंद आई मेरे लिए ख़ुशी की बात है. आपका सुझाव बेहद रुचिकर है इसपर विचार अवश्य करूँगा आभार शुक्रिय.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 17, 2012 at 11:56am

आदरणीया सुमन जी आपको ग़ज़ल पसंद आई बहुत-2 शुक्रिय.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 17, 2012 at 11:55am

शैलेन्द्र जी सराहना हेतु आभार

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 17, 2012 at 11:55am

आदरणीय अरुण सर तहे दिल से आभार, सर आज भिवाड़ी शादी में जा रहा हूँ और कल प्रातःकाल पुनः वापिस आऊंगा, कल आपसे मिलता हूँ कृपया बताएं कि गुडगाँव में कहाँ ठहरे हैं सादर.

Comment by वीनस केसरी on December 17, 2012 at 2:54am

शानदार ग़ज़ल है
यह शेअर विशेष रूप से पसंद आया

चाहता हूँ भूलके सब, दो कदम आगे चलूँ,
और खुद तकदीर से मैं अबतलक जीता नहीं.

तोलना है तोल लो..... में काफिये को बहुत अच्छे से निभा ले गये हैं :))))

शानदार ग़ज़ल है बधाई स्वीकारें

भाव के विषय में एक निवेदन है कि गमे-जानां (व्यग्तिगत दुःख) से गमे-दौरा (समाज का दुःख) की ओर बढ़ें तो ग़ज़ल में तेवर और भाव की गहरी और बढ़ जायेगी

Comment by SUMAN MISHRA on December 17, 2012 at 12:40am

आह निकलेगी नहीं, तुम लाख चाहो भी सनम,
दर्द की आदत मुझे है, मैं जखम सीता नहीं,.....bahut sunder shabdaawali

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on December 16, 2012 at 10:39pm

चाहता हूँ भूलके सब, दो कदम आगे चलूँ,
और खुद तकदीर से मैं अबतलक जीता नहीं.      एक अच्छी गजल पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें


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Comment by अरुण कुमार निगम on December 16, 2012 at 9:17pm

अरुण जी, मस्त ग़ज़ल, नए बिम्ब मन को भा गए .......

आंख को मरुथल समझ कर ,लौटते हो क्यों सनम
डूब कर देखो ,मेरा दिल प्यार से रीता नहीं ।

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