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उठे दर्द जब - उमड़े समंदर

लगी आग जलके, हुआ राख मंजर,
जुबां सुर्ख मेरी, निगाहें सरोवर,

लुटा चैन मेरा, गई नींद मेरी,
मुहब्बत दिखाए, दिनों रात तेवर,

सुबह दोपहर हर घड़ी शाम हरपल,
रही याद तेरी हमेशा धरोहर,

गिला जिंदगी से रहा हर कदम पे,
बिताता समय हूँ दिनों रात रोकर,

दिलासा दुआ ना दवा काम आये,
उठे दर्द जब और उमड़े समंदर.

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 26, 2012 at 11:26am

आभार आदरणीय अशोक सर

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 25, 2012 at 7:46pm

दिलासा दुआ ना दवा काम आये,
उठे दर्द जब और उमड़े समंदर.

वाह अरुण भाई जी सुन्दर भाव बधाई स्वीकारें.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2012 at 5:14pm

आभार आदरणीया महिमा श्री जी

Comment by MAHIMA SHREE on December 22, 2012 at 5:52pm

लगी आग जलके, हुआ राख मंजर,
जुबां सुर्ख मेरी, निगाहें सरोवर,

दिलासा दुआ ना दवा काम आये,
उठे दर्द जब और उमड़े समंदर.....बहुत खूब अनंत जी ....बधाई स्वीकार करें

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 22, 2012 at 5:21pm

आभार मित्रवर संदीप जी

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 22, 2012 at 4:53pm

waah bahut umda bandhuwar .......................

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 22, 2012 at 2:55pm

आदरणीया सीमा दीदी सराहना एवं आशीष हेतु अनेक-2 धन्यवाद

Comment by seema agrawal on December 22, 2012 at 2:35pm

लगी आग जलके, हुआ राख मंजर,
जुबां सुर्ख मेरी, निगाहें सरोवर,

.....बहुत बढ़िया अरुण सरोवर शब्द का बहुत खूब प्रयोग किया है आपने

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 22, 2012 at 11:17am

आभार आदरणीया सुमन जी.

Comment by SUMAN MISHRA on December 22, 2012 at 11:11am

पारदर्शी मन और आपकी पंक्तियाँ ,,,अच्छा तारतम्य है अरुण जी,,,,

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