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आभार श्री अरुण जी ग़ज़ल आपको पसंद आई मेरा लिखा सार्थक हुआ । वही शेर विशेष रूप से मुझे भी पसंद है !!
आचार्य श्री सलिल जी , आपका कहा ठीक है और स्वीकार्य भी । वैसे मैंने "उस राधा " के स्थान पर " बनावट वाली राधाओं " के बारे में लिखा है । पर आपका सुझाव सर आँखों पर मैं इसे अपनी डायरी में बदल देता हूँ । हार्दिक आभार सलाह हेतु !!
आदरणीया सुमन जी , रचना के अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार आपका !!
अरुण जी बेहतरीन ग़ज़ल कही है ढेरों दाद कुबूल करें सभी के सभी अशआर अच्छे हैं खासकर यह सबसे ज्यादा पसंद आये .
सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,
ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी याद आती है,
अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,
अरुण जी रचना खूब रुची किन्तु राधा और बनावट? यह समझ से परे है. राधा तो देश काल की परंपरा को चुनौती देकर भी सत्य और निष्काम अनुराग की अभिव्यक्ति का नाम है.
भाई अरुण अभिनव जी, स्पष्ट कहन से समृद्ध इस ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाइयाँ. मतला आज की विवश परिस्थिति को बखूबी ज़ाहिर करता हुआ है. उसका बयां होना काबिलेतारीफ़ तो है ही.
अंधेरों की सियासत से जो जुगनू बनके लड़ते हैं ,
सुबह की लालिमा श्रद्धा से उनको सिर नवाती है ।
इस शेर के लिये विशेष रूप से बधाई कह रहा हूँ. शुभेच्छाएँ और शुभकामनाएँ
मन की पुकार अपनी सी, अपनी मिटटी, अपनी जमीन और कैसा भी हो सब अपना,,,,बहुत खूबसूरत कविता है आपकी बधाई
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