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बलात 

-------

चप्पे चप्पे पर है दुशासन 
फिर मौन भला क्यों प्रशासन 
आपस में आलिंगन बद्ध 
करे किस का इन्तजार 
बलात्कार बलात्कार बलात्कार

था जिन पे हमें नाज 
आसमान लाल क्यों आज 
उड़ रहे अनगिनत बाज 
पंछी ले कैसे परवाज 
बताओ हमें इन्तजार 
बलात्कार बलात्कार बलात्कार

नन्ही कोमल सी कली 
नाज लाड़ पली बढ़ी 
नाग ने डस लिया
फंद में जकड़ लिया 
सुनाई पडी न चीत्कार 
बलात्कार बलात्कार बलात्कार

जल उठी हवस आग 
बिखर गए सारे राग
अश्रु नयन सूख गए 
बुझ गए जले दिए 
बता कहाँ करे गुहार
बलात्कार बलात्कार बलात्कार 
.
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 

२२-१२-२०१२

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 24, 2012 at 2:04pm

आदरणीया प्राची जी, 

सादर 

सही है 

आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 24, 2012 at 2:03pm

आदरणीय विजय सर जी, 

सादर अभिवादन 

आभार प्रोत्साहन हेतु 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 24, 2012 at 10:11am

शायद, अब इस विषय पर कुछ और कहने सुनने को मन नहीं...इसलिए कुछ भाव भी नहीं आ रहे मन में..

सादर.

Comment by vijay nikore on December 23, 2012 at 11:23pm

आदरणीय प्रदीप जी,

नन्ही कोमल सी कली

नाज लाड़ पली बढ़ी 

नाग ने डस लिया

फंद में जकड़ लिया
 
सुनाई पडी न चीत्कार
 
बलात्कार बलात्कार बलात्कार
वाह, वाह! सारी कविता ही अच्छी है, पर यह शब्द मन को छू गए।
सादर,
विजय निकोर
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 9:33pm

आदरणीय अनन्त जी, सस्नेह 

आप जैसे नवजवानो पर ही दारोमदार है 

आभार. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 9:30pm

आदरणीया सीमा जी, सादर अभिवादन 

यदि मैं अपनी बात कहने में सफल हुआ तो आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 9:28pm

आदरणीय लड़ी वाला जी,

सादर अभिवादन 

सुर में सहयोग हेतु आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 9:27pm

प्रिय महिमा श्रे जी, 

सस्नेह 

घटना ने झकझोर के रख दिया.ज्यादा कह नहीं सकते 

जुल्म हो मजलूमो पर हम चुप रह नहीं सकते 

आभार  

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 23, 2012 at 1:54pm

आदरणीय सौरभ गुरुदेव जी, 

सादर अभिवादन

आपका आशीष ही  मुझे लिखने को प्रोत्साहित करता है. 

आभार 

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 23, 2012 at 11:49am

आदरणीय सर मन के भीतर पल रहे आक्रोश को स्वर दिया है आपने, अब वक़्त आ गया है कि सोंच बदले, समझ बदले और इस तरह की घटनाओं से मुक्ति मिले, बधाई स्वीकारे.

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