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इस आसमान पर अधिकार तुम्हारा भी है...

ईश की अनुपम कृति मानव
और उसकी जननी तुम
फिर क्यों हो प्रताड़ित , अपमानित
पराधीन, मूक , गुमसुम ?
खुश होना तो कोई पाप नहीं
मुस्कुराने की इच्छा स्वार्थ नहीं!
नए विचारों की उड़ान भरो
शिक्षा का स्वागत करो !
जीवन न जाय व्यर्थ यूँ ही...
सदियों के बंधन से मुक्ति चाहिए ?
विद्रोह तो होगा, न घबराओ
निर्भय बनो, मानसिक सबलता लाओ !
रात बहुत गहरी हो चुकी
भोर का संदेसा दे चुकी !
मुस्कुराओ, पंख फैलाओ
उड़ने को तैयार हो जाओ
क्योंकि
इस आसमान पर अधिकार तुम्हारा भी है!!!

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Comment

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Comment by Anwesha Anjushree on January 11, 2013 at 6:53pm

Shukriya protsahan ke liye...Bagi ji..naman


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 10, 2013 at 9:12pm

//रात बहुत गहरी हो चुकी
भोर का संदेसा दे चुकी !
मुस्कुराओ, पंख फैलाओ
उड़ने को तैयार हो जाओ
क्योंकि
इस आसमान पर अधिकार तुम्हारा भी है!!!//

बहुत ही खुबसूरत अभिव्यक्ति, एक एक शब्द उम्मीद मे बंधे हुए हैं, बधाई स्वीकार करें आदरणीया अन्जुश्री |

Comment by Anwesha Anjushree on January 10, 2013 at 6:47pm

Vijay Nikore ji....Pradeep ji....abhar.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on January 10, 2013 at 5:00pm

जो रोके तो बताओ 

बधाई.

Comment by vijay nikore on January 8, 2013 at 6:48pm

अति सुन्दर भाव! बधाई।

विजय निकोर

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